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30 मई पत्रकारिता के समीक्षा का दिन है-आलोक कुमार श्रीवास्तव

वर्तमान समय में पत्रकारिता दशा एवं दिशा वर्तमान समय में पत्रकारिता अपने मूल उद्देश्य से भटक कर हासिये पर खड़ी दिखायी देती है कारण स्पष्ट है कि एक पत्रकार को अपने सीमित संसाधनों से असीमित प्रतिष्ठा की लड़ाई लड़नी है।
समाज देशकाल में उन्हें हर वक्त अपने अस्तित्व को बनाये रखने हेतु संघर्ष करना पड़ता है कारण स्पष्ट है कि एक पत्रकार सच्चाई व ईमानदारी से अपना फर्ज निभाना चाहता है तो कुछ सफेद पोश गुन्डे उसे अपने रास्ते से हटाने हेतु हर वक्त साजिश करते रहते है पत्रकारिता का कार्य चुनौतियों भरा है पत्रकार को अपने कत्र्तव्यों के प्रति सजग रहने की जरूरत है।
वर्तमान समय में पत्रकार ऐसे दल दलदल में फंस गये कि दलदल से निकलने हेतु उन्हें अति संघर्ष की आवश्यकता है। नहीं तो पत्रकारिता की दिशा और दशा दोनों पर प्रश्नचिन्ह लग जायेगा।
वर्तमान समय तक जागरूक जनता एवं जागरूक पत्रकार जैसी संस्था का गठन किया जाना है। ताकि जनता और पत्रकार में संवादहीनता की स्थिति उत्पन्न न हो सके।
भारत में पत्रकारिता का उद्भव अत्याचार, अन्याय और उत्पीडन के प्रतिषोध स्वरूप हुआ। 1766 ई0 में विलियम बोल्ट नामक एक अंग्रेज ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के भ्रष्ट अधिकारियों के अवांछित क्रियाकलापों के पर्दाफांस के लिये प्रतिशोधात्मक पत्रकारिता शुरू की लेकिन पत्र प्रकाशित करने के पूर्व ही उसे भारत से निष्कासित कर दिया गया। इंग्लैण्ड पहुंचकर बोल्ट ने कम्पनी के शोषणवाली प्रवृत्ति पर ‘कन्सीडिरेशन आफ इंडियन अफेयर्स’ नामक पुस्तक के माध्यम से प्रकाश डाला। इसी प्रकार जेम्स आंग्स्टस हिकी ने 1780 में बंगाल गजट नामक समाचार पत्र प्रकाशन कर कम्पनी की जन विरोधी गतिविधियों के बारे में कटु आलोचना प्रकाशित की जिस पर अंग्रेजी हुकूमत ने उसे भी नहीं बख्शा। उसे गिरफ्तार कर कारावास की सजा दी गयी, हिकी से तंग आकर ब्रिटिश हुकूमत ने उसका प्रेस भी जप्त कर लिया। इस प्रकार भारत का यह पहला पत्र प्रतिशोधात्मक पत्रकारिता का जनक माना जाता है।
भारत में प्रेस की स्थापना सूचना प्रसार के लिये विलियम बोल्ट का पोस्टर, बंगाल गजट, ने देशवासियों की आखंे खोल दी। इसके फलस्वरूप ही कलकत्ता से हिन्दी पत्रकारिता की शुरूआत हुई। कानपुर जनपद के मूल निवासी पं0 युगुल किशोर जो कलकत्ता के सदर दीवानी अदालत में वकालत को छोड़कर 1826 में पहले पहल हिन्दुस्तानियों की हितों के लिये ‘उदन्त मार्तण्ड’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन किया। इस प्रकार हिन्दी पत्रकारिता का जन्म स्थल कलकत्ता बनी। कलकत्ता दीर्घकाल तक ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी बना रहा। श्री शुक्ल ने अनेक प्रतिकूलताओं से जूझते हुये भी ‘उदन्त मार्तण्ड’ को एक वर्ष सात माह तक जिलाये रखा।हिन्दी का यह प्रथम पत्र देश की दशा व दिशा के प्रति बेहद सजग था। यह पत्र हिन्दी भाषी समाज और हिन्दी के स्वाभिमान की रक्षा का सचेष्ट प्रहरी था। 1947 के पूर्व जिन पत्रकारों ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये क्रान्ति की थी वे अब देश के नव निर्माण के लिये एक जुट होकर गौरवपूर्ण अतीत को दिखाकर सोये हुये राष्ट्र के मूर्छित चरित्र को नये ओज, नये पौरूष एवं नूतन स्वाभिमान से ओत प्रोत किया। विश्व में शांति और अभ्युदय के मंच पर भारत को अवतरित कराने में हिन्दी पत्रकारों की अविस्मरणीय भूमिका रही है।
कलम और क्रान्ति के ये पुजारी स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सद्भाव, सद विवेक और सद विचार के मानदण्ड बन गये। राष्ट्र निर्माण के कार्य को सफल बनाने के लिये जनमत जागरण का उत्तरदायित्व पत्रकारों के कंधे पर आ गया।
आजादी के बाद अनेक अंग्रेजी समाचार पत्र भारतीय औद्योगिक प्रतिष्ठानों के हाथ में आ गये। भारतीय प्रतिष्ठानों के नये वातावरण में विकास तथा प्रसार का अवसर मिला। वर्तमान समय की पत्रकारिता का पूर्णरूप से व्यवसायीकरण होता जा रहा है।
अब पत्रकारों के हाथ से कलम को छीनकर उनके स्थान पर लैपटाप, कम्प्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट, सेटेलाइट जैसे साधनों से लैशकर पूर्णतया मशीनीकृत पत्रकार बना दिया है इससे पलक झपकते ही समाचारों को प्राप्त करना पर्याप्त मात्रा में पत्रो का प्रकाशन करना और रंग बिरंगे छपाई से युक्त होकर हिन्दी पत्रकारिता निरन्तर समृद्ध हो रही है।
हिन्दी पत्रकारिता दिवस 30 मई के अवसर पर सभी पत्रकारों को अपने उद्भव से लेकर अब तक के इतिहास का गहन अध्ययन और समीक्षा करना चाहिए। ई मीडिया और प्रचार माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के बीच समाचार पत्रों की गौरव गरिमा बनाये रखने के लिए हिन्दी पत्रकारिता से जुडे पत्रकारों को नित्य नये खोज परक समाग्रियों को प्रकाशित करना चाहिए। समाज में फैली अनेक कुरीतियों को दूर करने हेतु हिन्दी पत्रकारिता जगत से जुड़े हुए सभी पत्रकारों को सार्थक पहल करना होगा।

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अनुराग श्रीवास्तव विचारपरक के पत्रकार है |

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