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हिन्दी पत्रकारिता का गौरवमयी इतिहास-अनुराग श्रीवास्तव

हिन्दी पत्रकारिता का गौरवमयी इतिहास है। अपने जन्म काल से आज तक निरन्तर चुनौतियों का सामना करते हुए हिन्दी पत्रकारिता तेजी से अन्य भाषायी समाचार पत्रों को पीछे छोड़ते हुए प्रगति की दौर में आगे बहुत आगे है।
उत्तर प्रदेश के कानपुर निवासी पं0 युगल किशोर शुक्ल रोजगार के सिलसिले में कलकत्ता गये थे। किन्तु देश के हालात देख उन्होंने अपना इरादा बदल दिया।
30 मई 1826 को शुक्ल जी ने हिन्दी साप्ताहिक समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन प्रारम्भ किया था। हिन्दी समाचार पत्रों को उद्भव और विकास का इतिहास गौरवमयी रहा है। आज हिन्दी पत्रकारिता और पत्रकार किसी भाषा के मुहताज नहीं है।
किसी शायर ने पत्रकारिता की महत्ता का आंकलन करते हुये कहा है कि ‘‘कलम के सिपाही यदि सो गले तो वतन के सिपाही वन बेंच देंगे, मतलब स्पष्ट है कि पत्रकारिता कोई हंसी खेल नहीं अपितु त्याग, बलिदान तथा समाज व राष्ट्र के प्रति ईमानदार व जवाबदेही का पर्याप्त है।
क्योंकि जब समाज राष्ट्र दिशाहीनता की अंचेरी सुरंग के बियावान में राह दिशा पाने के लिये भटकता है तो ऐसे विकट समय में पत्रकारिता प्रकाश स्तम्भ का कार्य करता है। इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता है।
जब देश सदियों से पराधीनता की बेड़ी में जकड़ा हुआ था। आम जनता की कर्तव्यपूर्ण बोध की भावना का क्षरण हो चुका था। उनका आत्मविश्वास पूरी तरह से मर चुका था तो तत्कालीन महामनिषियों ने पत्रकारिता के ही माध्यम से सोचे जनमानस को झकझोर कर उन्हें अपने कर्तव्य के प्रति सजग किया था।
इस मिशन में लोक मान्य तिलक अपने स्वराज, महात्मा गांधी, अपने यंग दाण्डेया, गणेश शंकर विद्यार्थी अपने प्रताप समेत तमाम महामनिषियों ने तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से समाज को जगाकर उन्हें अपने कर्तव्यों के प्रति प्रेरित करने का कार्य किया जिसका सार्थक परिणाम देश की स्वधीनता के रूप में सामने आया इतना ही नहीं स्वाधीनता भारत में शासन की विकास परक नीतियों- कार्यक्रमों को भी आम जनमानस तक पहुंचाने का कार्य आज की पत्रकारिता का खूबी कर रहा है। इसके अलावा शासन सत्ता की निरंकुशता, भ्रष्टाचार के प्रति जनमानस को जागरूक करते हुए अपने दायित्वों के प्रति सजग रहा है।
शासन सत्ता के शिखर पर होने वाले भ्रष्टाचार चाहे वह बोफोर्स, तोप का मामला हो तो या चारा घोटाला या यूरिक भूमि आवंटन का घोटाला का सत्ताधीशों के संरक्षण में फल-फूल रहे भ्रष्टाचार, अपराध व किसी भी प्रकार की अनियमितता को उजागर करने में पत्रकारिता में अपने दायित्वों का निर्वहन करने में जरा भी शिथिलता नहींे बरती है। भ्रष्ट राजनेताओं, नौकरशाहों, की काली करतूतों को उजागर करने हेतु पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगों ने अपनी जान की बाजी लगाकर अपनी पत्रकारिता चर्म का ईमानदारी पूर्वक निर्वहन किया।
लेकिन इतना सब कुछ होने के बावजूद भी चोर बाजार वादी युग में पत्रकारिता का चोला ओढ़कर कतिपय लोगों ने अपने स्वार्थ पूर्ति हेतु पत्रकारिता की जड़ों को खोखला किया है।
जिसकी वजह से पत्रकारिता का स्वरूव जो पहले मिशन जन सेवा के रूप में प्रतिष्ठापित था अब काफी हद तक व्यवसाय के रूप में तबदील हो गया है। अधिकांश पत्र-पत्रिकायें बड़े बड़े बड़े सेठ, साहूकारों, पूंजीपतियों के संसाधनों से संचालित हो रही है ऐसे में उनके आर्थिक, राजनैतिक हितों की अन देखी, कर पाना आज के भौतिक वादी युग में असम्भव तो नहीं लेकिन मुश्किल भरा जरूर है।
भले ही वह पत्रकारिता के पवित्र उद्देश्यों को दूषित करता हो हर प्रकार की असुरक्षा चाहे वह वित्तीय हो, पारिवारिक व व्यक्तिगत आज की पत्रकारिता के लिये चुनौती बन गये है।
इन तमाम झंझाबातों कोझेलते रहने के बावजूद भी पत्रकारिता की दशा दुर्दशा आज चाहे जो भी हो रही हो, लेकिन दिशा कल भी था और आज भी वही है भले ही उसकी गति में कतिपय परिस्थितियों के चलते अंतर आ गया हो, और कल भी वही रहेगा ऐसा विश्वास है।,पत्रकारिता दिवस 30 मई के अवसर पर सभी पत्रकारों को अपने कार्यो की स्वतः समीक्षा करना चाहिए। और यदि कार्यो में सुधार की आवश्यकता हो तो किया जाना चाहिए।

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अनुराग श्रीवास्तव विचारपरक के पत्रकार है |

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