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शोहरतगढ़ क्षेत्र के निजी स्कूलो की मनमानी रोकी जाय

अभिषेक श्रीवास्तव
विचारपरक संवाददाता
शोहरतगढ़ (सिद्धार्थनगर) 17 अप्रैल,शोहरतगढ़ तहसील क्षेत्र में चल रहे कई निजी स्कूलो में मनमानी ढ़ग से शुल्क वसूला जा रहा है इससे क्षेत्र के अभिभावक परेशान है। क्षेत्र के कई अभिभावको ने प्रदेश सरकार से मांग किया है कि निजी स्कूलो में मनमानी फीस वसूली बंद करायी जाए ।
आज यहां यह जानकारी देते हुए शैक्षिक सूत्रो ने बताया है कि प्राइवेट स्कूलों को बढ़ावा देने का खेल 1970 के दशक में शुरू हुआ। 1986 में नई शिक्षा नीति लागू की गई। प्राइवेट स्कूलों को खोलने की मंजूरी इस शर्त पर मिली थी वह गरीब बच्चों को फ्री एडमिशन देंगे, 86वें संशोधन द्वारा 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित हुआ और 1 अप्रैल 2010 से पूरे देश में लागू किया गया। इसमें यह व्यवस्था थी कि 6 से 10 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा दी जायेगी। साथ ही प्राइवेट एवं पब्लिक स्कूल 25 प्रतिशत गरीब बच्चों का फ्री नामांकन अवश्य करेंगे।
प्राइवेट विद्यालय गरीब बच्चों का फ्री नामांकन तो करते नहीं उल्टे कमाई का जरिया बन गये है। महंगे एडमिशन फार्म और महंगी फीस से अपनी तिजोरियां भर रहे है। यह विडंबना नहीं तो क्या है कि बच्चों को अपने ही विद्यालय के अगली कक्षा में प्रवेश शुल्क देना पड़ रहा है। स्कूलों के मान्यता की जो शर्ते रखी गई थी उसमें सभी स्कूलों का रंग सफेद होना चाहिए। विद्यालय का अपना निजी भवन या कम से कम 10 वर्ष तक किराये या लीज पर ली गई भवन पर स्थित हो।
हर क्लास रूम का न्यूनतम क्षेत्रफल 180 वर्ग फीट से कम ना हो। मान्यता के लिए निर्धारित मानकों के पालन की बात कौन कहे, बिना योग्यताधारी शिक्षकों से शिक्षण कार्य कराया जा रहा है। निजी स्कूलों को 3 साल के भीतर सभी नियम और मापदण्ड अपनाने होंगे वरना स्कूलों को बंद कर दिया जायेगा। वर्तमान में अधिकांश निजी विद्यालय उक्त मानक व मापदण्ड पर खरे नहीं उतरते। ना तो उनका रजिस्ट्रेशन है न तो मानक के मुताबिक कमरे हैं। इन विद्यालयों में खेलकूद का मैदान और न ही खेलकूद को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है। केवल पाठ्य पुस्तकें पढ़ा कर बच्चों को मानसिक दबाव में रखा जाता है। स्कूल वर्क, होमवर्क के बाद बाकी समय विद्यालयों के वाहन में व्यतीत होता है।
ये प्राइवेट विद्यालय हर वर्ष बेतहाश फीस वृद्धि करते है। जबकि नियमानुसार शिक्षण शुल्क 3 साल के बाद बढ़ाया जाना चाहिए तथा 10 प्रतिशत से अधिक फीस वृद्धि नहीं होना चाहिए।
सूत्रो ने बताया है कि मनमाने शिक्षण शुल्क के साथ कम्प्यूटर शिक्षा, विकास शुल्क, लाइब्रेरी, खेलकूद, बिजली, पानी के नाम पर अलग से धन वसूला जाता है। ये विद्यालय मजबूर अभिभावकों का आर्थिक शोषण करते है। निजी स्कूलों द्वारा प्रत्येक वर्ष पाठ्यक्रम के नाम पर किताबें बदलने का फरमान जारी कर दिया जाता है। यहां तक कि कई विद्यालय हर वर्ष स्कूल ड्रेस तक बदल देते है और तो और स्कूलों में ही किताब, कापी, स्कूल ड्रेस, स्कूल बैग, टाई-बेल्ट आदि बेचने की व्यवस्था है और छात्रों या अभिभावकों का उसी विद्यालय से महंगे दामों पर खरीदने की बाध्यता भी है। इस सारे खेल में कहीं न कहीं शिक्षा विभाग के विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत है।
सूत्रो ने बताया है कि निजी स्कूलो की मनमानी धड़ल्ले से चल रहा है। लेकिन विभागीय जिम्मेदार मौन साधे हुए है। इंग्लिश मीडियम के स्कूलों को न्यूनतम छात्र संख्या के आधार पर मान्यता देने का नियम है। प्राइमरी से जूनियर हाईस्कूल के लिए 275 बच्चे और 10 क्लास रूप होना चाहिए। यह मानक पूरा नहीं करने वाले विद्यालय नियम के विपरीत संचालित हो रहे है।

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अनुराग श्रीवास्तव विचारपरक के पत्रकार है |

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