आज की ताजा खबर

महिला दिवस पर विविध आयोजन

(विचारपरक प्रतिनिधि द्वारा)
संतकबीरनगर 8 मार्च, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर जनपद के शिक्षण संस्थान स्वास्थ्य विभाग सहित समाजसेवी संस्थाओ में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस को हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर विद्ववतजनो द्वारा विश्व में महिलाओ की भूमिका व उनकी आवश्यकताओ पर विस्तार पूर्वक जानकारी दी गई तथा आने वाले समय में भ्रूण हत्या से बालिकाओ की संख्या दिन प्रतिदिन कम होने के विषय पर भी चिन्तन मंथन किया गया। शिक्षण संस्थाओ में बालिकाओ को अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के विषय में जानकारी देते हुए वर्तमान समय में और उनके जीवन काल के दौरान उनके महत्वपूर्ण आवश्यकताओ के विषय में बताया गया कि वह किस दायरे में रहकर समाज के अन्दर वह अपनी भूमिका निर्वहन कर सकती है। इस अवसर पर उपस्थित विद्ववतजनो द्वारा शिक्षा प्राप्त कर रही छात्राओ से भी उनके विचार लिए गए तथा तर्कसंगत उनके उत्तर दिये गये।
आज जनपद के कई शिक्षण संस्थाओ एवं स्वास्थ्य विभाग में गोष्ठीयो का आयोजन किया गया और महिलाओ के अधिकार के विषय में विद्ववतजनो द्वारा जानकारी दी गई। माता का हमेशा सम्मान हो मां अर्थात माता के रूप में नारी, धरती पर अपने सबसे पवित्रतम रूप में है। माता यानी जननी। मां को ईश्वर से भी बढ़कर माना गया है, क्योंकि ईश्वर की जन्मदात्री भी नारी ही रही है।
मां देवकी (कृष्ण) तथा मां पार्वती (गणपतिध् कार्तिकेय) के संदर्भ में हम देख सकते हैं इसे। किंतु बदलते समय के हिसाब से संतानों ने अपनी मां को महत्व देना कम कर दिया है। यह चिंताजनक पहलू है। सब धन-लिप्सा व अपने स्वार्थ में डूबते जा रहे हैं। परंतु जन्म देने वाली माता के रूप में नारी का सम्मान अनिवार्य रूप से होना चाहिए, जो वर्तमान में कम हो गया है, यह सवाल आजकल यक्षप्रश्न की तरह चहुंओर पांव पसारता जा रहा है। इस बारे में नई पीढ़ी को आत्मावलोकन करना चाहिए। बाजी मार रही हैं लड़कियां अगर आजकल की लड़कियों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि ये लड़कियां आजकल बहुत बाजी मार रही हैं। इन्हें हर क्षेत्र में हम आगे बढ़ते हुए देखा जा सकता है । विभिन्न परीक्षाओं की मेरिट लिस्ट में लड़कियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं। किसी समय इन्हें कमजोर समझा जाता था, किंतु इन्होंने अपनी मेहनत और मेधा शक्ति के बल पर हर क्षेत्र में प्रवीणता अर्जित कर ली है। इनकी इस प्रतिभा का सम्मान किया जाना चाहिए। कंधे से कंधा मिलाकर चलती नारी नारी का सारा जीवन पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में ही बीत जाता है। पहले पिता की छत्रछाया में उसका बचपन बीतता है। पिता के घर में भी उसे घर का कामकाज करना होता है तथा साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखनी होती है।
उसका यह क्रम विवाह तक जारी रहता है। उसे इस दौरान घर के कामकाज के साथ पढ़ाई-लिखाई की दोहरी जिम्मेदारी निभानी होती है, जबकि इस दौरान लड़कों को पढ़ाई-लिखाई के अलावा और कोई काम नहीं रहता है। कुछ नवुयवक तो ठीक से पढ़ाई भी नहीं करते हैं, जबकि उन्हें इसके अलावा और कोई काम ही नहीं रहता है। इस नजरिए से देखा जाए, तो नारी सदैव पुरुष के साथ कंधेसे कंधा मिलाकर तो चलती ही है, बल्कि उनसे भी अधिक जिम्मेदारियों का निर्वहन भी करती हैं। नारी इस तरह से भी सम्माननीय है। विवाह पश्चात विवाह पश्चात तो महिलाओं पर और भी भारी जिम्मेदारियां आ जाती है। पति, सास-ससुर, देवर-ननद की सेवा के पश्चात उनके पास अपने लिए समय ही नहीं बचता।
वे कोल्हू के बैल की मानिंद घर-परिवार में ही खटती रहती हैं। संतान के जन्म के बाद तो उनकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। घर-परिवार, चैके-चूल्हे में खटने में ही एक आम महिला का जीवन कब बीत जाता है, पता ही नहीं चलता। कई बार वे अपने अरमानों का भी गला घोंट देती हैं घर-परिवार की खातिर। उन्हें इतना समय भी नहीं मिल पाता है वे अपने लिए भी जिएं। परिवार की खातिर अपना जीवन होम करने में भारतीय महिलाएं सबसे आगे हैं। परिवार के प्रति उनका यह त्याग उन्हें सम्मान का अधिकारी बनाता है।

About The Author

अनुराग श्रीवास्तव विचारपरक के पत्रकार है |

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Enter the text from the image below