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मलयगन्ध में गांव गरीब समाज की वास्तविक चित्रण प्रस्तुत है

(अनिल कुमार श्रीवास्तव)
बस्ती 23 फरवरी, पूवी उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध कवि डा0 परमात्मा प्रसाद निर्दोष द्वारा रचित पुस्तक मलयगन्ध में गांव गरीब समाज की वास्तविक चित्रण किया गया है। कवि द्वारा अपनी माटी को सजोये रखा गया है। कवि द्वारा अपनी प्राचीन परम्पराओं और नैतिकता के मानदण्डांे को बढ़ावा दिया गया है।
कवि द्वारा रचित मलयगन्ध पुस्तक का लोकार्पण प्रेस क्लब बस्ती के सभागार में 3 दिसम्बर 2017 को प्रोफेसर रामदेव शुक्ल अध्यक्ष हिन्दी विभाग दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर द्वारा किया गया। प्रसिद्ध साहित्यकार कमलापति पाण्डेय, कार्यकारी अध्यक्ष साहित्य संसद बस्ती द्वारा मलयगन्ध के सम्बन्ध में कहा गया है कि परमात्मा प्रसाद उपाध्याय निर्दोष ने बड़ी निश्छलता और सरलता से अपनी भूमिका में खुले मन से अपनी बात कही है। मलयगन्ध के रचयिता डा0 परमात्मा प्रसाद निर्दोष ने आत्म कथन में कहा है कि अपने गांव, घर, परिवार, विद्यालय, समाज आदि में रहते हुए और सब कुछ करते हुए विद्यालय आते जाते कुछ पंक्तियां मन मष्तिष्क को एकाकार कर निकली जिनको गुनगुनाते और लिखते रहने के पश्चात कभी कभार अपने सुहृदय लिखने पढ़ने वाले मित्रों के बीच में सुनाया जिन्होंने सहज ही सुनकर सराहा और कहा कि कितना अच्छा होता यह पुस्तकाकार पढ़ने को मिलता, परिणामतः मुझे उक्त सराहना से बड़ा बल मिला और मन में भाव आया कि न इन कविताओं को एक पुस्तक का रूप दिया जाय।
उन्हांेने पुस्तक में कमी होने की बात करते हुए ‘छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई, सुनिहहिं वाल बचन मन लाई।’ उन्होंने अपना मन बढ़ाने वाले साहित्यकारों डा0 राजेन्द्र प्रदेशी, डा0गिरिजा शंकर द्विवेदी, डा0श्याम सिंह शशि, डा0तेज नरायन कुसवाहा, डा0रामेश्वर वर्मा, डा0रमाकांत श्रीवास्तव, श्यामलाल यादव, सुमेश्वर प्रसाद यादव, कैप्टन एसपी सिंह उर्फ आतिश सुल्तानपुरी, भद्रसेन सिंह बन्धु, बाल सोम गौतम, सलीम वस्तवी, साहिद बस्तवी, सरबत जमाल, कमलापति पाण्डेय, भगवती प्रसाद पाण्डेय, का विशेष योगदान रहा है।
मलयगन्ध में वाणी वन्दना, दीपावली, स्वतन्त्रता दिवस, नियत बदलों, पथिक, गहन्तम अंधियार में, नव वर्ष, मौसम के फूल, सांवन, अभिशप्त जीवन, माली के लाल, एक दिया, प्रेमाकुंर, ईश वन्दना, आत्म दीप, दिल की गीत, बापू का गांव, वोट के व्यापार से, दूब हरी हैं, गीतकार, गांधी और खादी, भारत देश हमारा है, रिश्ते की डोर, मुक्त, गजल, तुम्हे याद होगा, बादल, पेड़ हमारा जीवन है, निर्दोष भाव, सच से बैर झुठ से नाता, शिल्पी जो है चित्र बनाता, नया जमाना, मतदाता जागो, झूठ देव की महिमा, मन का ठौर, विचारों का जहर, तमस, नेह का दीप, तेरी यादव, ध्रुआं, दुराचार के बिरवै, बदलाव, नियत, पांचो अंगुली घी में, सेवा शुल्क, चुनाव, चुनावी परिणाम, राह के पत्थर, फूल और कांटा, धर्म की सोच, अच्छा होता, सपनों का संसार, अंधकार, लोक, ध्वंस वृत्ति, न्याय के लिए, बचपन, स्वर्ण विहान, हम सफर, होली चन्छ, बैशाखी, पागल हवा, कैसी आंधी, सद्भाव पर अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रकाश डाला गया है।
भारतीय मान्यता के अनुसार वाणी वन्दना में कवि ने लिखा है कि- ‘‘वीणा बादिनी! वीणा की झनकार सुना दे, देश प्रेम जन-जन में आकर मातु जगादे, इसकी माटी में उपजे है अनगिन मोती, तू अतीत की गौर गाथा फिर लौटा दे।
स्वतन्त्रता दिवस की महत्ता पर-‘‘राष्ट्र कीर्तिस्वाधीन दिवस प्रति वर्ष पाहुने आता है, भूली बिसरी स्मृतियों में जन गण मन गीत सुनाता है।’’ नीयत बदलों-‘‘जागो देश के सूरज चन्दा बिगड़ी है जो सूरत बदलों, अंधकार न रहे कहीं पर मेरे प्यारे भारत बदलों।’’ आत्म दीप में कवि ने-आत्मदीप को जला, मिटायें तम जहान का, रह न जाये फर्क अब जमीन आसमान का।’’ वोट के व्यापार पर प्रहार करते हुए कवि ने कहा है कि-खड़ी करों दीवार न भईया वोटों के व्यापार से, भिन्न है रंग रूप हम फूल गले इक डाल से।’’ गांधी और खादी पर कवि ने- ‘‘पहन करके खादी रहन अपनी बदलो, मलिनता मिटाओं चलन अपनी बदलो।’’ कवि ने अपनी गजल में- ‘‘अपनी ही जमी छोड़ कर जाया न करें आप अच्छा हो हवा महल बनाया न करें आप।’’ तुम्हे याद होगा में कवि ने अपनी दर्द प्रस्तुत करते हुए कहा है कि-‘‘तुम्हे याद होगा नयन जब मिले थे, मेरे तेरे दिल में सुमन भी खिले थे, बहुत कुछ हुआ फिर भी शिकवे गिले थे, तुम्हे याद होगा नयन जब मिले थे।’’ पर्यावरण के सम्बन्ध में वृक्षों की महत्ता पर कवि ने कहा है कि-‘‘पेड़ है भूषण धरा का, पेड़ है जीवन हमारा, फूल फल देता निरन्तर सृष्टि का श्रंृगार सारा, दूर कर देता प्रदूषण शुद्ध हो जाती हवाएं, दे रहा है प्राणियों को बिना पैसे की दवाएं।’’ नये जमाने पर प्रहार करते हुए कवि ने कहा है कि-‘‘सब स्वतन्त्र है लोक तंत्र है नया जमाना जहां देखिए वहीं भला कैसा मनमाना।’’ तमस पर कवि ने लिखा है कि-‘‘आंख में पानी भरा पानी जिगर का मर गया सीप में मोती बनें कैसे जो पानी झर गया।’’ कवि ने अपनी दर्द तेरी याद में लिखा है कि-‘‘न जाने याद में कब से तेरी पलके बिछाये है, प्रिय ! तेरे लिए हमने दिये दिल के जलाये है।’’ हमसफर पर कवि ने लिखा है-‘‘हम तुम्हारे हम सफर हों, यह सफर हरदम रहें साथ जब तेरा मिला है, अब न कोई गम रहे।’’ कवि ने होली की महत्ता पर लिखा है-‘‘मन में उमंग धरि रंग पिचकारी भरि, हाथ में गुलाल लेके गाल को मलत है।’’
मलयगन्ध के रचयिता डा0परमात्मा प्रसाद निर्दोष का जन्म बस्ती जिले के खजुरिया कोडरा पाण्डेय ग्राम में 01 जनवरी सन् 1947 को हुआ। उन्होंने एम0ए0 तक की शिक्षा प्राप्त करने के साथ ही विद्या वाचस्पति की डिग्री भी प्राप्त किया। उन्हें आचार्य रामचन्द्र शुक्ल परिषद अगौना, जिला विधिक सेवा प्राधिकारण सिविल बार बस्ती ब्रहम्ण महासभा गोरखपुर विक्रमशिला हिन्दी विद्या पीठ, भागलपुर बिहार, जागृति संस्था बस्ती, शहीद स्मारक समिति बस्ती, संस्कार भारती, वरिष्ठ नागरिक सम्मान, मंजरी मौल श्री सम्मान मिल चुका है वे कविता कहानी, नाटक, लेख लिखते है जिनका प्रकाशन देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में समय समय पर होने के साथ ही आकाश वाणी और दूर दर्शन से प्रसारित भी हुआ है। पूर्व माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य पद से सेवा निवृत्त होने के बाद वे साहित्यिक सेवा और समाज सेवा में पूरी निष्ठा से लगे हुए है। उनकी निष्ठा, लगन लोगों को समाज सेवा और साहित्यिक सेवा का प्रेरणा प्रदान कर रहा है।
मलयगन्ध का प्रकाशन कोशल पब्लिशिंग हाउस नाका बाईपास इलाहाबाद रोड फैजाबाद से हुआ है। पुस्तक का मुद्रण कार्य आशीष प्रिन्टर्स दिल्ली से हुआ है। पुस्तक का मूल्य 250 रूपया रखा गया है।
डा0 परमात्मा प्रसाद निर्दोष की रचना मलयगन्ध का प्रकाशन बेहतर है, उन्हें ‘‘विचारपरक’’ हिन्दी दैनिक परिवार की ओर से हार्दिक बधाई स्वीकार हो, समीक्षक को उनके अगले पुस्तक की प्रतीक्षा है।

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अनुराग श्रीवास्तव विचारपरक के पत्रकार है |

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