आज की ताजा खबर

भक्ति मे ही शक्ति है- पं0 अजय शास्त्री

(विचारपरक प्रतिनिधि द्धारा)
संतकबीरनगर 8 दिसम्बर , खलीलाबाद सदर विधायक दिग्विजय नारायण जय चैबे के आवास परिसर ग्राम भिटहा में श्रीमद भगावत कथा के 6 वें दिन वृन्दावन से पधारे कथा वाचक आचार्य पं0 अजय शास्त्री जी महाराज ने श्रोताओ को बाल गोपाल के 56 भोग के विषय में एवं गोवर्धन पूजा प्रसंग का वर्णन किया। उन्होने कहा कि वृन्दावन धाम चारो धाम के बराबर है मनुष्य को मोह माया छोड़कर एक बार वृन्दावन का दर्शन अवश्य करना चाहिए।भक्ति मे ही शक्ति है।उन्होने कहा कि यमराज के डर से वृन्दावन वासी उनकी पूजा करते थे बाल गोपाल श्रीकृष्ण ने यमराज का डर दूर कर वृन्दावन वासियो से गोवर्धन पूजा कराया।
उन्होने कहा कि यह सुनकर कृष्ण जी ने तुरंत कहा मैइया हमारी गाय तो अन्न गोवर्धन पर्वत पर चरती है, तो हमारे लिए वही पूजनीय होना चाहिए। इंद्र देव तो घमंडी हैं वह कभी दर्शन नहीं देते हैं। कृष्ण की बात मानते हुए सभी ब्रजवासियों ने इन्द्रदेव के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा की। इस पर क्रोधित होकर भगवान इंद्र ने मूसलाधार बारिश शुरू कर दी।
वर्षा को बाढ़ का रूप लेते देख सभी ब्रज के निवासी भगवान कृष्ण को कोसने लगें। तब कृष्ण जी ने वर्षा से लोगों की रक्षा करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी कानी उंगली पर उठा लिया। इसके बाद सब को अपने गाय सहित पर्वत के नीचे शरण लेने को कहा। इससे इंद्र देव और अधिक क्रोधित हो गए तथा वर्षा की गति और तेज कर दी। इन्द्र का अभिमान चूर करने के लिए तब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा कि आप पर्वत के ऊपर रहकर वर्षा की गति को नियंत्रित करने को और शेषनाग से मेंड़ बनाकर पर्वत की ओर पानी आने से रोकने को कहा। इंद्र देव लगातार रात- दिन मूसलाधार वर्षा करते रहे। काफी समय बीत जाने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि कृष्ण कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। तब वह ब्रह्मा जी के पास गए तब उन्हें ज्ञात हुआ की श्रीकृष्ण कोई और नहीं स्वयं श्री हरि विष्णु के अवतार हैं।
इतना सुनते ही वह श्री कृष्ण के पास जाकर उनसे क्षमा याचना करने लगें।
इसके बाद देवराज इन्द्र ने कृष्ण की पूजा की और उन्हें भोग लगाया। तभी से गोवर्धन पूजा की परंपरा कायम है। मान्यता है कि इस दिन गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा करने से भगवान कृष्ण प्रसन्न होते हैं। कथावाचक पं0 अजय शास्त्री ने कहा कि इस कथा के अनुसार माता यशोदा बालकृष्ण को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी अर्थात बालकृष्ण 8 बार भोजन करते थे। एक बार जब इन्द्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया था, तब लगातार 7 दिन तक भगवान ने अन्न-जल ग्रहण नहीं किया। 8वें दिन जब भगवान ने देखा कि अब इन्द्र की वर्षा बंद हो गई है, तब सभी ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा, तब दिन में 8 पहर भोजन करने वाले बालकृष्ण को लगातार 7 दिन तक भूखा रहना उनके ब्रजवासियों और मैया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ।
तब भगवान के प्रति अपनी अनन्य श्रद्धाभक्ति दिखाते हुए सभी ब्रजवासियों सहित यशोदा माता ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 56 भोग बालगोपाल को लगाया। इस अवसर पर कथा को आयोजक पं0 सूर्य नारायण चतुर्वेदी, सूर्या एकेडमी के प्रबन्धक डा0 उदय प्रताप चतुर्वेदी, पूर्व ब्लाक प्रमुख नाथनगर राकेश चतुर्वेदी, सविता चतुर्वेदी, सर्वग चतुर्वेदी, अखण्ड प्रताप चतुर्वेदी, राजन चतुर्वेदी, गोमती प्रसाद चतुर्वेदी, मायाराम पाठक, बलराम यादव, चिन्तामणि, सहित भारी संख्या में सभ्रान्त नागरिक एवं श्रोतागण उपस्थित रहे।

About The Author

अनुराग श्रीवास्तव विचारपरक के पत्रकार है |

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Enter the text from the image below