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पूरी दुनिया कोरोना नामक एक अदृश्य शत्रु से जुझ रही है

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सिद्धार्थनगर , आज पूरी दुनिया कोरोना नामक एक अदृश्य शत्रु से जुझ रही है। चीन से आया हुआ यह वायरस दुनिया के लगभग एक, डेढ़ दर्जन देशों को छोड़ दे तो लगभग सारे देशों में ये व्याप्त है। 40 लाख से उपर लोग इसकी चपेट में आ चुके है, संक्रमित हो चुके है, लगभग 04 लाख काल-कवलित हो चुके है, इसी से इस वायरस की, इस महामारी की विभिषयता को आसानी से समझा जा सकता है चारो ओर यातायात बंद है, ट्रेने बंद है, लोगो का अवागमन बंद है, लोग अपने घरो में सिमट कर रह गये है। बड़े-बड़े उद्योग, धंधो के चक्के बंद है, उनकी चिमनियों से धुऐं नही निकल रहें है ये बड़ा एक आपदा का काल है।
इस अवसर पर हम बुद्ध को याद करने के लिए बैठे हुए है। हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री जी ने एक बार कहा था कि दुनिया ने युद्ध दिया और हमने दुनिया को बुद्ध दिया है, आखिर बुद्ध में ऐसा क्या है कि बार-बार जब भी ऐसा कोई संकट आता है, कोई कठिनाई आती है, कोई आपदा आती है तो दुनिया भारत की ओर देखती है और भारत के दार्शनिकों की ओर देखती है। गौतम बुद्ध इतिहास पुरुष है अभी ढाई हजार वर्ष पहले जिनका पूरा इतिहास ज्ञात है। यहि में कपिलवस्तु के साक्य गणराज्य के जो गणप्रमुख थे महराज शुद्धोदन उनकी संतान के रुप में उन्होने जन्म लिया 29 वर्ष कपिलवस्तु में रहे और फिर ज्ञान की खोज में वो निकल गये, ज्ञान प्राप्ति की खोज में 29 वर्ष की वय में कपिलवस्तु से निकले जिसको हम महाभिनिष्क्रमण कहते है, बुद्ध भारत के ही नही दुनिया के पहले ऐसे वैज्ञानिक दार्शनिक है जिन्होने कार्य कारण की नित्यता स्थापित की ये कोई अमूलतः चिन्तन करने वाले तत्व विमानसिय दर्शानिक नही है की जिनकी बात बाउंसर हो जाये उपर से निकल जाये या जल्दी लोग नही समझे बड़े सहज ढ़ग से जैसे उनकी बाते सहज थी , उन्होने कहां की ये संसार दुखमय है, ये जीवन इसका अर्थ मै यहि रुक के बाताते हुए मै चलू इससे कुछ लोग उन्हें दुखवादी दार्शनिक कह सकते है कहते भी है लेकिन ऐसा नही है वो कोई दुखवादी दार्शनिक भी नही थे जैसे मैने शुरु में कहा की वो तत्वविमांसिय दार्शनिक नही थे ऐसा कोई तत्वविमांसिय दर्शन उन्होने नही दिया ये सहज जीवन दर्शन है, जीवन से निकला दर्शन है, हम सब अनुभव करते है आम आदमी से लेकर के बड़ा से बड़ा व्यक्ति भी यह अनुभव करता है कि हमें बड़ी कठिनाई है, हमें बड़ा दुख है, बड़ी परेशानी है किसी से बात किजिये 10 मिनट के बाद वह अपनी परेशानी बताने लगता है, यानि जीवन में दुख है। चार आर्य सत्य जिनको कहा गया है उनके शिक्षाओं के आधार स्तम्भ है की संसार में दुख है,दुख का समुदय है कारण है और दुख के कारण का निरोध है और कारण के निरोध से दुख का निरोध है जैसे की अगर कोई चीज है तो उसका कारण है वो जाकि कृपा पंगु गिरि लंघै आंधर को सब कुछ दरसाई वाले दार्शनिक नही थे। आजादी के बाद हमने इस देश में अपने यहां भी पश्चिमी विकास के उस माडल को स्वीकार किया जो वहां चल रहा था और जिससे लगा की यहि विकास का एक सही तरिका है, पश्चिम के चिन्तन में हैं कि मनुष्य श्रेष्ठ है, मनुष्य प्रमुख है और शेष समस्त श्रृष्टि उस मनुष्य के उपभोग के लिए है पूरी दुनिया पशु, पक्षी, जीव, जन्तु, नदी, नाले, पर्वत, पहाड़, सागर सब उस मनुष्य के लिए है ये जो चिन्तन का अन्तर है पश्चिमी चिन्तन ये मानता है कि ये सब कुछ मनुष्य एतद जो श्रृष्टि है वो उसी मनुष्य के लिए है और मनुष्य को उस श्रृष्टि का उपभोग करने का अधिकार है वो अपने अधिकार का प्रयोग करता है, नदियों को प्रदुषित करता है, वायुमंडल को प्रदुषित करता है, धरती का तापमान बड़ाता है ओजोन की परत क्षरित करता है, गेलेशियर को सिकुड़ने के लिए बाध्य करता है वो जो मन में आये शो करता है तो ये जो दुरविवार भोग है उस भोग के कारण आज जो स्थिया आई ये थोड़ा पहले से इसका संकेत मिलने लगा था अभी 24 अप्रैल को पूरी दुनिया ने पृथ्वी दिवस मनाया ये पृथवी दिवस है क्या? लगभग 50 वर्ष पहले बहुत ज्यादा नही केवल 50 वर्ष पहले दुनिया के लोगो को, नेताओं को, विचारको को ये लगा की भाई इस पृथ्वी को बचा चाहिए क्योकि इस पृथ्वी का तो गड़बड़ हो रहा है, सब कुछ गड़बड़ हो रहा है तो पृथ्वी दिवस एक दिन वर्ष में एक दिन तय किया गया जैसे मदर्स-डे अभी आपने मनाया होगा, फ्रेन्डर्स-डे मनाते है, फादर्स-डे मनाते है, कि एक दिन हम पृथ्वी दिवस मनाये और पृथ्वी को बचाने के लिए संकल्प ले अरे भाई इस संकल्प का क्या फायदा की आज पर्यावरणविध कहने लगे है की लगभग 10 लाख वर्ग वन्य जीव और वनस्पतियां उनकी प्रजातियां इस धरती से लुप्त हो चुकी है एक दो नही 10 लाख वन्यजीवों और वनस्पतियों की प्रजातियां जिस धरती से लुप्त हो जाये आप उस धरती के सौन्दर्य की कल्पना कर सकते है प्रकृति लगातार चेतावनी दे रही है भाई हम अन्धे और बहरे हो जाये न सुने न महसुस करें तो ये अलग बात है पिछले 20 वर्षो में आप अनुभव करें, प्रकृति ने कितनी बार चेतावनी दी सुनामी आइर्, अनेक चक्रवात आये, भूकम्प आया, दशो बिमारियां इधर आयी सास, निपाह, ईबोला, एच0आई0वी0 ये क्या था? ये प्रकृति की चेतावानी है जिसे हमारे बहरे कानो ने नही सुना वो थोड़ो और तीव्र रुप में आ गई।
आज तमाम सारे देश अपने यहां लाकडाउन किये हुए है अदभुद संयोग है की जो हमको कष्ट दे रहा है उसमें भी कुछ धवल निकल रहा है। आप देखे कि पर्यावरणविध कहने लगे है, मीडिया में भी ये आने लगा है की 25 से 30 प्रतिशत नदियां शुद्ध हो गयी है, महानगरो के वायुमंडल ध्वनी और वायु प्रदुषण से मुक्त हो रहे है आकाश निर्मल होगया अभी पिछली पूर्णिमा को जो चाद दिखा था क्या अदभुद चाद दिखा था साहब कितनी निर्मल चादनी पूरे धरती में और आकाश में नहराव रहा था संस्कृति के उषा काल से ही कहते आये की वसुधैव कुटुम्बकम् वसुधा हमारा कुटुम्ब है जब कभी सचिदान्नद ब्रहम के मन में ये भाव जगा होगा कि एकोहं बहुस्यामः हम एक है या अनेक हो और उस अनेक होने के क्रम में उन्होने श्रृष्टि को रचा, प्रकृति को रचा ये नदी, नाले, तलाब, आकाश, अन्तिरिक्ष, इंसान, जीव-जन्तु, वनस्पतियां, हम आप सब उसने बनाये और जब एकोहं बहुस्यामः तो वही है न उसमें भी उस तितली में भी वही है, उस दूब में भी वही है, उस पहाड़ में भी वही है इसलिए हम लोगो को बचपन से ये पढ़ाया गया कि यत् पिण्डे तत् ब्रहाण्डे कण कण में वह व्यापत है और जब कण कण में वह व्यापत है तो उस कण कण की हम पूजा करते है, आराधना करते है कितना बड़ा हमारा कुटुम्ब था। भाई कभी विचार किजीयें आज के महानगरों में जो पिछले बीस वर्षो से जो युवा है बीस पच्चीस जो महानगरों में रहकर के पल रहे है, बड़ रहे, पढ़ रहे है उनके लिए शायद मेरी ये बाते अजुबा सी लगे कितना बड़ा हमारा कुटुम्ब था, दादा, परदादा रहते थे, काका, चाचा, ताउ के बच्चे पोते रहते थे ये तो मनुष्य थे, आगंन की गौरइयां थी हमारे कुटुम्ब के भीतर, दुवारे की गईया हमारे कुटुम्ब की हिस्सा थी, घर का कुआं हमारे कुटुम्ब की हिस्सा था, गांव का पोखर हमारे कुटुम्ब की हिस्सा था, शक्ति माई का चैरा हमारे कुटुम्ब की हिस्सा था, गाव के बाहर खड़ा पीपल हमारे कुटुम्ब की हिस्सा था, कोश दो कोश पर बहती नदी नाला जो भी हो गंगा मईया थी वो भी हमारे कुटुम्ब की हिस्सा थी और किसी भी मांगलिक अवसर पर इन सबको हम आमंत्रित करते थे, बुलाते थे, सबका उसमें भाग होता था, सबका उसमें हिस्सा होता था, आज भी हम प्रतिकात्मक ढ़ग से सबकों आमंत्रित करते है बुलाते है उनके हिस्से को उनको देते है, सौपते है कहां गया ये कुटुम्ब आज इस लाकडाउन में जिन शुभ अवसर और पक्षों की मैने चर्चा की एक और बात आप ध्यान दे कितना थोड़े में जिने लगे है, कितना चाहिए ये तो चाहिए था, कबीर को तो ये चाहिए था और हम कबीर के वंशज हमकों क्या चाहिए इसे ज्यादा क्यों चाहिए साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय। मै भी भूखा ना रहू, साधु न भूखा जाय। ये भूख तक चाहिए भोजन, अन्न, आप जानते है कि हमारे ऋषियों ने सबसे पहले ब्रहम किसे माना, जो कोषो की गड़ना करते है। तो अन्नमय कोष की बात करते है तो ये स्थियां हमारी थी और हम इन स्थियों से विलक्षित हुए है, ऐसे में हमको करना क्या है। ये जो परिदृष्य आया है आज इसमें बुद्ध हमारी कहां तक सहायता कर सकते है। शुरु मे मैने अपनी बात यहां से शुरु की थी की वह दुनिया के पहले वैज्ञानिक दार्शनिक है, जो ये कहता है, भविष्य के सपने मत बुनो भूत में मत उलझों वर्तमान में ध्यान दो यानि जो हमारा वर्तमान है इस पर ध्यान दे, ध्यान देने के लिए क्या है, की जो शासकीय निर्देश आ रहे है सोशल डिस्टेन्सिंग ये शब्द मै नही पचापाता, भौतिक दूरी हो सकता है, मास्क लगाना, स्वच्छता, हाथ साफ करना, कपड़े धोना, कपड़े बदलना, नहाना, इसी को तो कभी हमने पोंगापंथ कहा था, कर्मकांड कहा था, यहि तो होता था कि भाई हाथ धोकर घर में प्रवेश करों, पैर धो कर घर में प्रवेश करों, कही बाहर से आये हो तो स्नान कर लों, कपड़ा बदल लो, लेकिन जो हमारी संस्कृति के उज्जवल तत्व थे, उसको तो पोंगापंथ, कर्मकांड के नाम पर हमने क्रमशः खारिज कर दिया, निरस्त करते गये, ये सब पोंगापंथ है, जूता पहनकर कीचन में जायेंगे जूता पहनकर भोजन करेंगे, बिना हाथ धोये भोजन करेगें, अरे शेर कही मूह धोता है हाथ धोता है, ये जोे चीजे चली, उसे ये चिजे बिगड़ी है, और आज गौतम बुद्ध के उस वाक्य को ध्यान रखे, वर्तमान पर ध्यान दो, अब हमें आज का वर्तमान ठीक करना है, ठीक कैसे होगा तो स्वच्छता से होगा, ठीक कैसे होगा, तो भारतीय जड़ी-बूटीयों पर आधारित जो हमारी चिकित्सा पद्धति है, बार-बार आयुष मंत्रालय जिसके लिये निर्देश दे रहा है, कि ये हमारी इम्मूयन सिस्टम को बढ़ाता है, कोरोना एक वायरस है, जो अभी मर नही रहा है जिसका इल्लाज नही ढूढा जा रहा है लेकिन हाथ धोने से मर जाता है, कपड़े में कही है तो हाथ धोने से मर जाता है, लेकिन जबतक उसका हम इल्लाज नही ढूढ पा रहे है, पूरी दुनिया लगी है ढूढ लेंगे मनुष्य का संकल्प बड़ा विराट होता है, हमारे पराक्रम की कोई सीमा नही है ढूढ लेगें लेकिन जबतक नही ढूढ पा रहे है तब तक शासकीय निर्देशों का अनुपालन करते हुए हम अपने वर्तमान को ठीक करें।
बुद्ध के इस जीवन मंत्र की स्वीकार करें न ही वेरेन वेरानि, सम्मन्तीध कुदाचनं अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो’बेर से बेर कभी सम्माप्त नही होता दुश्मनी से दुश्मनी कभी समाप्त नही होती, अवेरेन प्रेम, प्रेम से बेर को समाप्त किया जा सकता है, आगे वो कहते है, भाई क्या बड़ी मूखर्ता है, क्रोध के विषय में की किसी के प्रति हमारे मन में अगर बेर है दुश्मनी है, हम क्रोध पाले हुए है, अदभुत उधाहरण दिया है गौतम बुद्ध ने वो कहते है कि क्रोध क्या है? जरा इसपर ध्यान दे क्रोध वो जलता हुआ अंगारा है कोयला है जिसे हमने दूसरे के फेकने के लिए अपने हाथ में रखा हुआ है। अरे भाई जब दूसरा दिखेगा, मिलेगा, आप उसपर फैकेगे वहां तक पहुचेगा की नही पहुचेगा, तब तक तो आप अपना हाथ ही जला रहे है, वो कहते है क्रोध येहि है, यानि क्रोध आपको भीतर-भीतर जलता है, इसलिए क्रोध को हटाईये, प्रेम का मार्ग, मैत्री का मार्ग, करुणा का मार्ग बुद्ध इस रास्ते पे चलने की बात करते है, हजार लड़ाईयो से कुछ नही होना जाना है, उन लड़ाईयों की तुलना में अपने को जितने की बात करते है, की अपने को आप जिते दूसरो की सहायता करें, बुद्ध कहते है कि जैसे एक दिया है एक दीये से हजार दीप जलाये जा सकते है, हजारों दीया जलाने के बाद भी उस एक दीये की रोशनी कही कम नही होती है, ये आप है अगर आपने हजार-हजार लोगो को अपना प्रेम बाटा, ज्ञान बाटा, सहायता की, तो आपका प्रेम, ज्ञान आपका जो मूल सत्व है ये कहि कम नही होगा बल्कि बढ़ेगा ही सहायता के लिए बड़ा बढ़िया बडा़ विलक्षण उदाहरण गौतम बुद्ध ने दिया है कि जैसे एक दीया से हजारों दीया जलाई जा सकती है लेकिन उस एक दीया की रोशनी कम नही होती खुद उसकी रोशनी में कोई फर्क नही पड़ता है, इसलिए आप हजारों का सहयोग कर सकते है, हजारो से मैत्री कर सकते है, हजारों के प्रति करुणा और आपका मन निर्मल रहेगा, सदा निर्मल रहेगा, वो कहते है कि सत्य एक बड़ा जीवन अनमोल है और सत्य पर चलने वाला, उन्होने कहा तीन चीजे कभी छिपे ही नही सकती सूर्य, चन्द्र के बाद कहते है सत्य, सत्य कभी छिप नही सकता इसलिए जो भी व्यक्ति सत्य का अनुपालन करता है, सत्य का जीवन में प्रयोग करता है, वो कोई गलती कर ही नही सकता, उसके लिए गौतम बुद्ध ने कहा वो केवल दो गलतिया कर सकता है। या तो वो चले ही नही अपने लक्ष्य की ओर या पूरा रास्ता न चले लेकिन उसका पतन असम्भव है, सत्य को यदि उसने स्वीकार कर लिया तो उसका पतन असम्भव है, रास्ता अपने लक्ष्य को पाये न पाये क्योकि वो कहते है लक्ष्य महत्वपूर्ण नही है, यात्रा को ठीक से सम्पन्न करना चाहिए, यहि बात गांधी साधन के अर्थ में कहते है। साधन भी महत्वपूर्ण है, वही बात गौतम बुद्ध कहते है कि यात्रा ठीक से सम्पन्न होनी चाहिए, विचार की यात्रा होनी चाहिए, जीवन की यात्रा होनी चाहिए, कर्म की यात्रा होनी चाहिए, ये ठीक से यात्रा अपनी सम्पन्न होनी चाहिए सत्य के आधरित होनी चाहिए, मैत्री और करुणा को लेकर चलना चाहिए और अगर इन विचारो को हमने मान लिया तो आज बहुत सी समस्यायें जो आज है, और कल को आने वाली है, उनका हम समाधान ढुढ़ सकते है, कहि न कहि हमको अपनी उन भारतीय सांस्कृतिक विरासत है उसकी ओर जाना पड़ेगा अभी जो मैने कहां जिन कुओं की, जिन तालाबो की बात की जिन फूलों पर मडराते हुऐ भवरो, मधुम्ख्यिों की बात कही, घर के मुडेर पर सगुन उचारते जिन कौओं की बात कही, वहां फिर से हमें जाना पड़ेगा, क्योकि वही जीवन है, ये जो पश्चिमी विकास का माण्डल है, कंकरिट के बड़े-बड़े जंगल से निजात पाना पड़ेगा, कृषि आधारित हमको विकास का एक टिकाअु माडल स्वीकार करना पड़ेगा, बनाना पड़ेगा ये अच्छी बात है भारत सरकार इस दिशा में सोच रही है पहल कर रही है, इस दिशा में हमको भी जो भी जुड़े विचारवान लोग है जो कुछ सुन समझ सकते है और कर सकते है अपनी सीमा में उन्हें इन चीजो पर ध्यान देना होगा, क्योकि गौतम बुद्ध मानते है इस दुख को जो संसार में है जीवन में है इसको यदि दूर करना है, तो उसके कारण को दूर करना होगा और कारण उन आकांक्षाओं पर लगाम लगाना होगा, समाप्त करना होगा, त्रृष्णा ही दुख का कारण है, तो पहले त्रृष्णा को मिटाईयें, क्योकि चार आर्य सत्य में वे कहते है कि दुख निरोध संभव है क्योकि दुख समुदय की कारण का निर्वाण हमने कर कर दिया तो दुख का निर्वाण हो जायेगा, यदि हमने अपनी त्रृष्णा मार दी खत्म कर दी तो दुख हमारा समाप्त हो जायेगा, लगभग 45 वर्ष लगातार पूरे इस क्षेत्र में जिस क्षेत्र में हमलोग रह रहे है श्रावस्ती से लेकर के मगध बौद्ध गया, सारनाथ, कौशाम्बी तक घुम-घुम के पैदल गौतम बुद्ध यहि उपदेश देते गये की भैइया संसार में चार ही आर्य सत्य है और इन्ही चार आर्य सत्यों को ठीक से हम समझ ले तो हमारा जीवन सार्थक हो जायेगा, वो कहते है कि किसी अतिवाद में मत पडा़े, अतिभोग, अति की विलाषिता, अति का धन संचय, कपड़ा लत्ता, सम्पति सब कुछ अति को हटा करके दोनो अतियों की वो बात करते है, भूख की अति भी, शरीर को गलाने की अति भी नही और भोग की अति भी नही इसलिए उन्होने अपना यह मंत्र दिया जिनके आधार पर हमें आगे बढ़ना है दुख का विरोध करना है , दुख को मिटाना है, वो मध्य प्रतिप्रदा है, मध्यम मार्ग वो मध्यम मार्ग की बात करते है और इसी को उन्होनें एवं उनके बाद के संतो ने, विचारको ने, भक्तो ने, जिनके लिए के लिए उन्होनें कहा था अत दीपो भव ये सब जो कुछ मैने कहा हैवह तुम तभी मानो जब तुम्हारा मन उसे स्वीकार करें, अपना प्रकाश स्तम्भ स्वयं बनों और जब तुम बनजाओगें, अपने भीतर तुम देख लोगे, स्वयं पर विजय पा लोगे, सत्य की आराधना करोगे तब तुम्हें ये मार्ग दिखने लगेगा, सम्यक दृष्टि अष्टांगिक मार्ग में पहली दृष्टि सही दृष्टि, दृष्टि ठीक होनी चाहिए और दृष्टि कब ठीक होगी स्टेन्ड प्वांइट से आपका व्यूव प्वाइंट ठीक होता है आप कहां खड़े है, कुछ लोग एंसी जगह खडा़ रहते है जहां से हीलही नही सकते हिलना ही नही चाहते पकड़े है साहब उसी को जड़ को, जड़ विद्या को, जड़ बुद्धि को नही साहब हम तो ठीक है। जरा अपने स्टेंड प्वाइंट को ठीक करिये क्योकि वही से आपका व्यूव प्वांइट तय होता है सही दृष्टि सम्यक दृष्टि गौतम बुद्ध ने कहा की हमें अपनी दृष्टि ठीक करनी होगी, भोग के प्रति, विलाशिता के प्रति दुरविवार इच्छाओं के प्रति, त्रृष्णा के प्रति, और सही दृष्टि क्या है, करुणा, दया, मैत्री, अंहिसा, त्याग, अपरिग्रह इनके आाधार पर एक सुन्दर समाज बनाने की कल्पना हमारे भीतर आनी चाहिए, दृष्टि हमारी ठीक होनी चाहिए, दूसरा है सम्यक संकल्प उस दृष्टि के आधार पर हमको एक संकल्प लेना होगा, कल प्रधानमंत्री जी कह रहे थे कोरोना हारेगा, हम लोग भी कहते है हारेगा, क्योकि मनुष्य का संकल्प बड़ा होना चाहिए विराट होना चाहिए तो एक संकल्प होना चाहिए की दुख से छुटकारा मिलेगा, ये संकल्प, दुख से छुटकारा के लिए एक सही संकल्प की आवश्यकता होती है। तीसरा है सम्यक वाक्य, वाणी कई बार गौतम बुद्ध से ऐसे अनेक-अनेक प्रश्न पूछे गये जिनके बारे में उन्हें कुछ नही कहना था, ईश्वर है? नही है? पुनरजन्म होता है। नही होता है ऐसे प्रश्नों पर जो असहज प्रश्न थे उस पर वह मौन रह जाते थें, क्योकि मौन को भी उन्होने एक उत्तर माना की तथागत मौन है , इस प्रश्न पर तथागत मौन है, तो कहते है कि सम्यक वाणि हो, वाणि की पवित्रता हो अपने यहां बहुत लम्बे समय से कहां गया है कि बोलने के पहले हजार बार सोचो, वाणि में शुद्धता होनी चाहिए, पावनता होनी चाहिए, पवित्रता होनी चाहिए, तो सम्यक वाक्य वाणि की पवित्रता और उसके बाद सम्यक कर्मान्त जिसके लिए कहां की, आचरण की शुद्धि, कर्म की शुद्धि, अपने यहां तो कर्मयोग बहुत दिन से चलता आ रहा है, कर्म प्रमुख है। कर्म पर ही आपका अधिकार है, सम्यक कर्म, सम्यक कर्म, आचरण जिसमें क्रोध है, दुराचार है, व्हामचार है, चोरी है, अति संग्रह है, इनसे अलग रहना, इनसे दूर रहना अचारण को शुद्ध रखना, सम्यक कर्मान्त आचारण की शुद्धता और सम्यक आजीव, सम्यक आजीवका जो हमारी आजीवका को न्याय पूर्ण हो, सम्यक का अर्थ यहां न्याय से है, सम्यक अजीविका न्याय पूर्ण उचित सहज कर्म करके उचित कर्म करके न्याय पूर्ण ढ़ग से जो हम अर्जन कर रहे है उसी पर हमारा अधिकार है और हमारा उसी अर्जन पर यदि अधिकार है तो इसका अर्थ है हमको तो उसको बाटना ही है क्योकि हमारी संस्कृति अपने उषा काल से यहि कहती आ रही है त्याग पूर्वक भोग करों, सम्यक व्यायाम का अर्थ है शुभ की उत्तपति के लिए प्रयास करना हमेशा शुभ के लिए प्रयास करना, सम्यक स्मृति चित के एकाग्र भाव से मांसिक एकाग्रता को स्मृति को बनाये रखना सम्यक ढंग से आखिरी सम्यक समाधि सारे कर्मो को करते रहेंगे आपकी दृष्टि यदि सही है, दुख से छुटकारा के लिए यदि आपने अच्छा दृणसंकल्प लिया है, वाणि यदि आपकी पावन है, आचरण शुद्ध है, न्याय पूर्ण ढंग की आजिविका चला रहे है, शुभ की उत्तपति के लिए प्रयत्न कर रहे है चित आपका एकाग्र है तो आखिर में आपको र्निविक्लप प्रज्ञा की अनुभूति होगी इसी को वो सम्यक समाधि कहते है। और इस रास्ते पे चलकर हम भारतीयजन न केवल भारत के लिए न केवल इस धरती के लिए बल्कि पूरी श्रृष्टि को एक बार पुनः सुन्दर बना सकते है।
प्रो. सुरेन्द्र दूबे
कुलपति
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु सिद्धार्थनगर

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अनुराग श्रीवास्तव विचारपरक के पत्रकार है |

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