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पत्रकारिता व्यवसाय नहीं धर्म है-अवधेश कुमार श्रीवास्तव

पत्रकारिता सदैंव चुनौती भरा कार्य रहा है। बदलते परिवेश में पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। लेकिन पत्रकारिता कभी भी व्यवसाय नहीं हो पायेगी। पत्रकारिता धर्म है।
वर्तमान में पत्रकारिता की परिभाषाएं बदल गयी हैं। आने वाली नयी पीढी ने अपनेे मन माफिक कार्य करना आरम्भ कर दिया है ऐसा नहीं है कि अच्छे लोग ही नहीं है एक तरफ जहां पर पीत पत्रकारिता का रोग कुछ लोगों को लगने लगा है वहीं पर प्रिन्ट मीडिया के अनेकों संवाददाताओं ने अफगानिस्तान एंव इराक के युद्ध में अपने प्राणों को हथेली पर रखकर पत्रकारिता करके यह दिखा दिया कि हममें उत्साह या आत्मबल की कमी नहीं इस दौरान कुछ तो ने अपने प्राण भी गवां बैठें फिर भी हमारे पूर्वजों ने जो बुनियाद पत्रकारिता की डाली थी उस पर हम खरे नहीं उतर रहे हैं। हममें वह त्याग नहीं रहा जिसकी आवश्यकता थी अखबारों की संख्या अवश्य बढ़ी तमाम अखबार रंग बिरंगे छपने लगे पर उनकी सोच में एका-एक परिवर्तन हो गया और पाठक भी मन मसोस कर मजबूर है ऐसी खबरों को पढने के लिए पत्रकारिता को पूर्णतः व्यवसाय बना दिया गया अनेकों ऐसे अखाबरों का प्रकाशन आरम्भ हुआ जिनका मुख्य उद्देश्य विज्ञापनों को ही प्रकाशित कर अद्दिक से अद्दिक द्दन कमाना है उनका समाज की समस्याओं से कुछ भी लेना देना नहीं है।
अब पार्टियों के अखबार हो गए, ऐ मैं नहीं आम पाठक कह रहा है, हम भी सुख के भोगी हो गए पहले हममें ऐ कमी नहीं थी, खबरों के लिए हम खबर की तह तक जाया करते थे अब तो परिस्थितियां बदल गयी वातानुकूलित कमरे में बैठकर राजस्थान में पानी का संकट लिखा जाय तो आप ही बताएं कितना न्याय होगा उस समस्या के प्रति।
हमें अपनी सोच में परिवर्तन लाना होगा आइए हम सभी कलम के सिपाही इस पत्रकारिता दिवस पे इस बात की शपथ लें कि हम अपने पूर्वजों के सपनों को साकार करेंगे।

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अनुराग श्रीवास्तव विचारपरक के पत्रकार है |

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