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नेपाल मे नेकपा एमाले के कार्यकर्ताओ मे आक्रोश बढ़ रहा है

(विचारपरक प्रतिनिधि द्वारा)
बढ़नी (सिद्धार्थनगर) 11 जनवरी, भारत के पड़ोसी मुल्क नेपाल का वर्तमान व आने वाला समय उसकी मौजूदा सरकार द्वारा किये जाने वाले निर्णय और उसके नतीजों पर काफी हद तक जा टिका है। हालांकि नेपाल की राजनीति पर अपनी पैनी नजर रखने वाले जानकार इस बात का जरूर दावा कर रहे कि आने वाले दिन उक्त हिमालयी मूलके लिए काफी बेहतर होने वाले है। लेकिन कईयो का यह भी दावा है कि इसको लेकर जो दूरियां मधेशी (भारतीय मूल) व पहाड़ी समुदाय के बीच उत्पन्न हुई है उसे पाटना शायद ही किसी के लिए संभव हो। फिलहाल नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहाल उर्फ प्रचंड व उनकी सरकार द्वारा इस मामले पर जिस तरह कदम उठाये जा रहे है, मधेशी समुदाय व उसके नेंताओं की नजरें जा टिकी हैं।सभी को इन्तजार है उस पल का जब सरकार द्वारा प्रस्तावित संविधान संसोधन कानून की शक्ल अख्तियार करेगा। मौजूद हालात ऐसे इसलिए हैं कि कभी श्री प्रचंड के माथे पर भारत विरोधी होनंे का ठप्पा चस्पा रहा।
अपने भारत विरोधी मुहिम के लिए श्री प्रचंड की दुनिया में जाने जाते रहे। हालांकि जानकारो की माने तो शायद यही उनके करीब 8 वर्ष पूर्व सत्ता से बाहर होने की वजह भी बनी। अब जबकि एक फिर उन्हे नेपाल की सरकार का नेतृत्व करने का अवसर मिला है, उनकी कोशिश है कि भारत विरोधी होने के ठप्पे को धुलने का पुरजोर प्रयास किया जाय। यही कारण है कि उन्होने मधेशियो को दिये जाने वाले अधिकारो की पुरजोर पैरवी शुरू कर दी है। इससे पूर्व सरकार का नेतृत्व करने वाली नेकपा एमाले और उसके पूर्व प्रधानमंत्री के0पी0 शर्मा ओले ने इस मामले मे स्पष्ट कर दिया है कि सरकार द्वारा किये जाने वाले संविधान संशोधन का संसद से सड़क तक प्रबल विरोध किया जायेगा। उधर उक्त हिमालयी देश मे सदियो से रह रहे मधेशी समुदाय के लोगो मे टकटकी मौजूदा सरकार और उसके द्वारा उठाये जाने वाले कदमो पर जा टिकी है।
उन्हे यह लग रहा कि वर्तमान सरकार द्वारा उठाये जाने वाले कदम और बनाये जाने वाले कानून आने वाले दिनो मे देश मे उनका भविष्य तय करेंगे। हालाकि यह बात भी स्पष्ट है श्री प्रचण्ड द्वारा इस बावत उठाये जाने वाले कदमो का पार्टी के असंतुष्ट नेताओ व कार्यकर्ताओ द्वारा विरोध हो रहा है। दूसरी ओर अपने अधिकारो के लिए सड़को पर उतरने वाले मधेशी समुदाय के समक्ष करो या मरो के हालात है ऐसे मे यदि सरकार की यह कोशिश विफल हुई तो संघर्ष के ऐसे अंतहीन सिलसिले की शुरूआत हो सकती है जिसका परिणाम कल्पना से बाहर होगा।
इसका आगाज बीते वर्ष मधेशी आंदोलन के दौरान देखने को मिला। मधेशियो के अंादोलन से उत्पन्न हालात और उससे उत्पन्न लपटे भारत नेपाल के सदियो पुराने संबन्धो को भी प्रभावित करने लगी थी। फिलहाल नेपाल सरकार द्वारा उठाये जाने वाला वर्तमान कदम देश के आने वाले भविष्य की दिशा और दशा तय करेगा।

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अनुराग श्रीवास्तव विचारपरक के पत्रकार है |

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