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देश में हिन्दी पत्रकारिता का उद्भव और विकास-अनिल कुमार श्रीवास्तव

हिन्दी पत्रकारिता की कहानी भारतीय राष्ट्रीयता की कहानी है। हिन्दी पत्रकारिता के आदि उन्नायक जातीय चेतना, युगबोध और अपने महत् दायित्व के प्रति पूर्ण सचेत थे। कदाचित् इसलिए विदेशी सरकार की दमन-नीति का उन्हें शिकार होना पड़ा था, उसके नृशंस व्यवहार की यातना झेलनी पड़ी थी। उन्नीसवीं शताब्दी में हिन्दी गद्य-निर्माण की चेष्ठा और हिन्दी-प्रचार आन्दोलन अत्यन्त प्रतिकूल परिस्थितियों में भयंकर कठिनाइयों का सामना करते हुए भी कितना तेज और पुष्ट था इसका साक्ष्य ‘भारतमित्र’ (सन् 1878 ई, में) ‘सार सुधानिधि’ (सन् 1879 ई.) और ‘उचित वक्ता’ (सन् 1880 ई.) के जीर्ण पृष्ठों पर मुखर है।
वर्तमान में हिन्दी पत्रकारिता में अंग्रेजी पत्रकारिता के दबदबे को खत्म कर दिया है। पहले देश-विदेश में अंग्रेजी पत्रकारिता का दबदबा था लेकिन आज हिन्दी भाषा का झण्डा चंहुदिश लहरा रहा है।
भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता का आरम्भ और हिन्दी पत्रकारिता भारतवर्ष में आधुनिक ढंग की पत्रकारिता का जन्म अठारहवीं शताब्दी के चतुर्थ चरण में कलकत्ता, बंबई और मद्रास में हुआ। 1780 ई. में प्रकाशित किये (भ्पबामल) का कलकत्ता गजट कदाचित् इस ओर पहला प्रयत्न था। हिंदी के पहले पत्र उदंत मार्तण्ड (1826) के प्रकाशित होने तक इन नगरों की ऐंग्लोइंडियन अंग्रेजी पत्रकारिता काफी विकसित हो गई थी।
इन अंतिम वर्षों में फारसी भाषा में भी पत्रकारिता का जन्म हो चुका था। 18वीं शताब्दी के फारसी पत्र कदाचित् हस्तलिखित पत्र थे। 1801 में हिंदुस्थान इंटेलिजेंस ओरिऐंटल ऐंथॉलॉजी (भ्पदकनेजींद प्दजमससपहमदबम व्तपमदजंस ।दजीवसवहल) नाम का जो संकलन प्रकाशित हुआ उसमें उत्तर भारत के कितने ही ष्अखबारोंष् के उद्धरण थे। 1810 में मौलवी इकराम अली ने कलकत्ता से लीथो पत्र ष्हिंदोस्तानीष् प्रकाशित करना आरंभ किया। 1816 में गंगाकिशोर भट्टाचार्य ने ष्बंगाल गजटष् का प्रवर्तन किया। यह पहला बंगला पत्र था। बाद में श्रीरामपुर के पादरियों ने प्रसिद्ध प्रचारपत्र ष्समाचार दर्पणष् को (27 मई 1818) जन्म दिया। इन प्रारंभिक पत्रों के बाद 1823 में हमें बँगला भाषा के समाचार चंद्रिका और संवाद कौमुदी, फारसी उर्दू के जामे जहाँनुमा और शमसुल अखबार तथा गुजराती के मुंबई समाचार के दर्शन होते हैं।
यह स्पष्ट है कि हिंदी पत्रकारिता बहुत बाद की चीज नहीं है। दिल्ली का उर्दू अखबार (1833) और मराठी का दिग्दर्शन (1837) हिंदी के पहले पत्र उदंत मार्तंड (1826) के बाद ही आए। उदंत मार्तंड के संपादक पंडित जुगलकिशोर थे। यह साप्ताहिक पत्र था। पत्र की भाषा पछाँही हिंदी रहती थी, जिसे पत्र के संपादकों ने ष्मध्यदेशीय भाषाष् कहा है। यह पत्र 1827 में बंद हो गया। उन दिनों सरकारी सहायता के बिना किसी भी पत्र का चलना असंभव था। कंपनी सरकार ने मिशनरियों के पत्र को डाक आदि की सुविधा दे रखी थी, परंतु चेष्टा करने पर भी उदंत मार्तंड को यह सुविधा प्राप्त नहीं हो सकी।
हिंदी पत्रकारिता का 1826 ई. से 1873 ई. तक को हम हिंदी पत्रकारिता का पहला चरण कह सकते हैं। 1873 ई. में भारतेन्दु ने हरिश्चंद्र मैगजीन की स्थापना की। एक वर्ष बाद यह पत्र हरिश्चंद्र चंद्रिका नाम से प्रसिद्ध हुआ। वैसे भारतेन्दु का विवेचन सुधा पत्र 1867 में ही सामने आ गया था और उसने पत्रकारिता के विकास में महत्वपूर्ण भाग लिया थाय परंतु नई भाषाशैली का प्रवर्तन 1873 में हरिश्चंद्र मैगजीन से ही हुआ। इस बीच के अधिकांश पत्र प्रयोग मात्र कहे जा सकते हैं और उनके पीछे पत्रकला का ज्ञान अथवा नए विचारों के प्रचार की भावना नहीं है। उदंत मार्तंड के बाद प्रमुख पत्र हैं बंगदूत (1829), प्रजामित्र (1834), बनारस अखबार (1845), मार्तंड पंचभाषीय (1846), ज्ञानदीप (1846), मालवा अखबार (1849), जगद्दीप भास्कर (1849), सुधाकर (1850), साम्यदंड मार्तंड (1850), मजहरुलसरूर (1850), बुद्धिप्रकाश (1852), ग्वालियर गजेट (1853), समाचार सुधावर्षण (1854), दैनिक कलकत्ता, प्रजाहितैषी (1855), सर्वहितकारक (1855), सूरजप्रकाश (1861), जगलाभचिंतक (1861), सर्वोपकारक (1861), प्रजाहित (1861), लोकमित्र (1835), भारतखंडामृत (1864), तत्वबोधिनी पत्रिका (1865), ज्ञानप्रदायिनी पत्रिका (1866), सोमप्रकाश (1866), सत्यदीपक (1866), वृत्तांतविलास (1867), ज्ञानदीपक (1867), कविवचनसुधा (1867), धर्मप्रकाश (1867), विद्याविलास (1867), वृत्तांतदर्पण (1867), विद्यादर्श (1869), ब्रह्मज्ञानप्रकाश (1869), अलमोड़ा अखबार (1870), आगरा अखबार (1870), बुद्धिविलास (1870), हिंदू प्रकाश (1871), प्रयागदूत (1871), बुंदेलखंड अखबर (1871), प्रेमपत्र (1872) और बोधा समाचार (1872)।
इन पत्रों में से कुछ मासिक थे, कुछ साप्ताहिक। दैनिक पत्र केवल एक था समाचार सुधावर्षण जो द्विभाषीय (बंगला हिंदी) था और कलकत्ता से प्रकाशित होता था। यह दैनिक पत्र 1871 तक चलता रहा। अधिकांश पत्र आगरा से प्रकाशित होते थे जो उन दिनों एक बड़ा शिक्षाकेंद्र था और विद्यार्थीसमाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। शेष ब्रह्मसमाज, सनातन धर्म और मिशनरियों के प्रचार कार्य से संबंधित थे। बहुत से पत्र द्विभाषीय (हिंदी उर्दू) थे और कुछ तो पंचभाषीय तक थे। इससे भी पत्रकारिता की अपरिपक्व दशा ही सूचित होती है। हिंदीप्रदेश के प्रारंभिक पत्रों में बनारस अखबार (1845) काफी प्रभावशाली था और उसी की भाषानीति के विरोध में 1850 में तारामोहन मैत्र ने काशी से साप्ताहिक सुधाकर और 1855 में राजा लक्ष्मणसिंह ने आगरा से प्रजाहितैषी का प्रकाशन आरंभ किया था। राजा शिवप्रसाद का बनारस अखबार उर्दू भाषाशैली को अपनाता था तो ये दोनों पत्र पंडिताऊ तत्समप्रधान शैली की ओर झुकते थे। इस प्रकार हम देखते हैं कि 1867 से पहले भाषाशैली के संबंध में हिंदी पत्रकार किसी निश्चित शैली का अनुसरण नहीं कर सके थे। इस वर्ष कवि वचनसुधा का प्रकाशन हुआ और एक तरह से हम उसे पहला महत्वपूर्ण पत्र कह सकते हैं। पहले यह मासिक था, फिर पाक्षिक हुआ और अंत में साप्ताहिक। भारतेन्दु के बहुविध व्यक्तित्व का प्रकाशन इस पत्र के माध्यम से हुआ, परंतु सच तो यह है कि हरिश्चंद्र मैगजीन के प्रकाशन (1873) तक वे भी भाषाशैली और विचारों के क्षेत्र में मार्ग ही खोजते दिखाई देते हैं।
भारतेन्दु युग हिंदी पत्रकारिता का दूसरा युग 1873 से 1900 तक चलता है। इस युग के एक छोर पर भारतेन्दु का हरिश्चंद्र मैगजीन था ओर नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा अनुमोदनप्राप्त सरस्वती। इन 27 वर्षों में प्रकाशित पत्रों की संख्या 300-350 से ऊपर है और ये नागपुर तक फैले हुए हैं। अधिकांश पत्र मासिक या साप्ताहिक थे। मासिक पत्रों में निबंध, नवल कथा (उपन्यास), वार्ता आदि के रूप में कुछ अधिक स्थायी संपत्ति रहती थी, परंतु अधिकांश पत्र 10-15 पृष्ठों से अधिक नहीं जाते थे और उन्हें हम आज के शब्दों में विचारपत्र ही कह सकते हैं। साप्ताहिक पत्रों में समाचारों और उनपर टिप्पणियों का भी महत्वपूर्ण स्थान था। वास्तव में दैनिक समाचार के प्रति उस समय विशेष आग्रह नहीं था और कदाचित् इसीलिए उन दिनों साप्ताहिक और मासिक पत्र कहीं अधिक महत्वपूर्ण थे। उन्होंने जनजागरण में अत्यंत महत्वपूर्ण भाग लिया था।
उन्नीसवीं शताब्दी के इन 25 वर्षों का आदर्श भारतेन्दु की पत्रकारिता थी। कविवचनसुधा (1867), हरिश्चंद्र मैगजीन (1874), श्री हरिश्चंद्र चंद्रिका (1874), बालबोधिनी (स्त्रीजन की पत्रिक, 1874) के रूप में भारतेन्दु ने इस दिशा में पथप्रदर्शन किया था। उनकी टीकाटिप्पणियों से अधिकरी तक घबराते थे और कविवचनसुधा के पंच पर रुष्ट होकर काशी के मजिस्ट्रेट ने भारतेन्दु के पत्रों को शिक्षा विभाग के लिए लेना भी बंद करा दिया था। इसमें संदेह नहीं कि पत्रकारिता के क्षेत्र भी भारतेन्दु पूर्णतया निर्भीक थे और उन्होंने नए नए पत्रों के लिए प्रोत्साहन दिया। हिंदी प्रदीप भारतजीवन आदि अनेक पत्रों का नामकरण भी उन्होंने ही किया था। उनके युग के सभी पत्रकार उन्हें अग्रणी मानते थे।
भारतेन्दु के बाद इस क्षेत्र में जो पत्रकार आए उनमें प्रमुख थे पंडित रुद्रदत्त शर्मा, (भारतमित्र, 1877), बालकृष्ण भट्ट (हिंदी प्रदीप, 1877), दुर्गाप्रसाद मिश्र (उचित वक्ता, 1878), पंडित सदानंद मिश्र (सारसुधानिधि, 1878), पंडित वंशीधर (सज्जन -कीर्ति्त-सुधाकर, 1878), बदरीनारायण चैधरी प्रेमधन (आनंदकादंबिनी, 1881), देवकीनंदन त्रिपाठी (प्रयाग समाचार, 1882), राधाचरण गोस्वामी (भारतेन्दु, 1882), पंडित गौरीदत्त (देवनागरी प्रचारक, 1882), राज रामपाल सिंह (हिंदुस्तान, 1883), प्रतापनारायण मिश्र (ब्राह्मण, 1883), अंबिकादत्त व्यास, (पीयूषप्रवाह, 1884), बाबू रामकृष्ण वर्मा (भारतजीवन, 1884), पं. रामगुलाम अवस्थी (शुभचिंतक, 1888), योगेशचंद्र वसु (हिंदी बंगवासी, 1890), पं. कुंदनलाल (कवि व चित्रकार, 1891) और बाबू देवकीनंदन खत्री एवं बाबू जगन्नाथदास (साहित्य सुधानिधि, 1894)। 1895 ई. में नागरीप्रचारिणी पत्रिका का प्रकाशन आरंभ होता है। इस पत्रिका से गंभीर साहित्यसमीक्षा का आरंभ हुआ और इसलिए हम इसे एक निश्चित प्रकाशस्तंभ मान सकते हैं। 1900 ई. में सरस्वती और सुदर्शन के अवतरण के साथ हिंदी पत्रकारिता के इस दूसरे युग पर पटाक्षेप हो जाता है।
इन 25 वर्षों में हिन्दी पत्रकारिता अनेक दिशाओं में विकसित हुई। प्रारंभिक पत्र शिक्षाप्रसार और धर्मप्रचार तक सीमित थे। भारतेन्दु ने सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक दिशाएँ भी विकसित कीं। उन्होंने ही बाला बोधिनी (1874) नाम से पहला स्त्री- मासिक-पत्र चलाया। कुछ वर्ष बाद महिलाओं को स्वयं इस क्षेत्र में उतरते देखते हैं-भारतभगिनी (हरदेवी, 1888), सुगृहिणी (हेमंतकुमारी, 1889)। इन वर्षों में धर्म के क्षेत्र में आर्यसमाज और सनातन धर्म के प्रचारक विशेष सक्रिय थे। ब्रह्मसमाज और राधास्वामी मत से संबंधित कुछ पत्र और मिर्जापुर जैसे ईसाई केंद्रों से कुछ ईसाई धर्म संबंधी पत्र भी सामने आते हैं, परंतु युग की धार्मिक प्रतिक्रियाओं को हम आर्यसमाज के और पौराणिकों के पत्रों में ही पाते हैं। आज ये पत्र कदाचित् उतने महत्वपूर्ण नहीं जान पड़ते, परंतु इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने हिन्दी की गद्यशैली को पुष्ट किया और जनता में नए विचारों की ज्योति भी। इन धार्मिक वादविवादों के फलस्वरूप समाज के विभिन्न वर्ग और संप्रदाय सुधार की ओर अग्रसर हुए और बहुत शीघ्र ही सांप्रदायिक पत्रों की बाढ़ आ गई। सैकड़ों की संख्या में विभिन्न जातीय और वर्गीय पत्र प्रकाशित हुए और उन्होंने असंख्य जनों को वाणी दी।
आज वही पत्र हमारी इतिहासचेतना में विशेष महत्वपूर्ण हैं जिन्होंने भाषा शैली, साहित्य अथवा राजनीति के क्षेत्र में कोई अप्रतिम कार्य किया हो। साहित्यिक दृष्टि से हिंदी प्रदीप (1877), ब्राह्मण (1883), क्षत्रियपत्रिका (1880), आनंदकादंबिनी (1881), भारतेन्दु (1882), देवनागरी प्रचारक (1882), वैष्णव पत्रिका (पश्चात् पीयूषप्रवाह, 1883), कवि के चित्रकार (1891), नागरी नीरद (1883), साहित्य सुधानिधि (1894) और राजनीतिक दृष्टि से भारतमित्र (1877), उचित वक्ता (1878), सार सुधानिधि (1878), भारतोदय (दैनिक, 1883), भारत जीवन (1884), भारतोदय (दैनिक, 1885), शुभचिंतक (1887) और हिंदी बंगवासी (1890) विशेष महत्वपूर्ण हैं। इन पत्रों में हमारे 19वीं शताब्दी के साहित्यरसिकों, हिंदी के कर्मठ उपासकों, शैलीकारों और चिंतकों की सर्वश्रेष्ठ निधि सुरक्षित है। यह क्षोभ का विषय है कि हम इस महत्वपूर्ण सामग्री का पत्रों की फाइलों से उद्धार नहीं कर सके। बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, सदानं मिश्र, रुद्रदत्त शर्मा, अंबिकादत्त व्यास और बालमुकुंद गुप्त जैसे सजीव लेखकों की कलम से निकले हुए न जाने कितने निबंध, टिप्पणी, लेख, पंच, हास परिहास औप स्केच आज में हमें अलभ्य हो रहे हैं। आज भी हमारे पत्रकार उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। अपने समय में तो वे अग्रणी थे ही।
तीसरा चरण बीसवीं शताब्दी के प्रथम बीस वर्ष बीसवीं शताब्दी की पत्रकारिता हमारे लिए अपेक्षाकृत निकट है और उसमें बहुत कुछ पिछले युग की पत्रकारिता की ही विविधता और बहुरूपता मिलती है। 19वीं शती के पत्रकारों को भाषा- शैलीक्षेत्र में अव्यवस्था का सामना करना पड़ा था। उन्हें एक ओर अंग्रेजी और दूसरी ओर उर्दू के पत्रों के सामने अपनी वस्तु रखनी थी। अभी हिंदी में रुचि रखनेवाली जनता बहुत छोटी थी। धीरे-धीरे परिस्थिति बदली और हम हिंदी पत्रों को साहित्य और राजनीति के क्षेत्र में नेतृत्व करते पाते हैं। इस शताब्दी से धर्म और समाजसुधार के आंदोलन कुछ पीछे पड़ गए और जातीय चेतना ने धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना का रूप ग्रहण कर लिया। फलतः अधिकांश पत्र, साहित्य और राजनीति को ही लेकर चले। साहित्यिक पत्रों के क्षेत्र में पहले दो दशकों में आचार्य द्विवेदी द्वारा संपादित सरस्वती (1903-1918) का नेतृत्व रहा। वस्तुतः इन बीस वर्षों में हिंदी के मासिक पत्र एक महान साहित्यिक शक्ति के रूप में सामने आए। शृंखलित उपन्यास कहानी के रूप में कई पत्र प्रकाशित हुए – जैसे उपन्यास 1901, हिंदी नाविल 1901, उपन्यास लहरी 1902, उपन्याससागर 1903, उपन्यास कुसुमांजलि 1904, उपन्यासबहार 1907, उपन्यास प्रचार 19012। केवल कविता अथवा समस्यापूर्ति लेकर अनेक पत्र उन्नीसवीं शतब्दी के अंतिम वर्षों में निकलने लगे थे। वे चले रहे। समालोचना के क्षेत्र में समालोचक (1902) और ऐतिहासिक शोध से संबंधित इतिहास (1905) का प्रकाशन भी महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं। परंतु सरस्वती ने मिस्लेनी के रूप में जो आदर्श रखा था, वह अधिक लोकप्रिय रहा और इस श्रेणी के पत्रों में उसके साथ कुछ थोड़े ही पत्रों का नाम लिया जा सकता है, जैसे ष्भारतेन्दुष् (1905), नागरी हितैषिणी पत्रिका, बाँकीपुर (1905), नागरीप्रचारक (1906), मिथिलामिहिर (1910) और इंदु (1909)। सरस्वती और इंदु दोनों हिन्दी की साहित्यचेतना के इतिहास के लिए महत्वपूर्ण हैं और एक तरह से हम उन्हें उस युग की साहित्यिक पत्रकारिता का शीर्षमणि कह सकते हैं। सरस्वती के माध्यम से आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और इंदु के माध्यम से पंडित रूपनारायण पांडेय ने जिस संपादकीय सतर्कता, अध्यवसाय और ईमानदारी का आदर्श हमारे सामने रखा वह हिन्दी पत्रकारिता को एक नई दिशा देने में समर्थ हुआ।
परंतु राजनीतिक क्षेत्र में हिन्दी पत्रकारिता को नेतृत्व प्राप्त नहीं हो सका। पिछले युग की राजनीतिक पत्रकारिता का केंद्र कलकत्ता था। परंतु कलकत्ता हिंदी प्रदेश से दूर पड़ता था और स्वयं हिंदी प्रदेश को राजनीतिक दिशा में जागरूक नेतृत्व कुछ देर में मिला। हिंदी प्रदेश का पहला दैनिक राजा रामपालसिंह का द्विभाषीय हिंदुस्तान (1883) है जो अंग्रेजी और हिंदी में कालाकाँकर से प्रकाशित होता था। दो वर्ष बाद (1885 में), बाबू सीताराम ने भारतोदय नाम से एक दैनिक पत्र कानपुर से निकालना शुरू किया। परंतु ये दोनों पत्र दीर्घजीवी नहीं हो सके और साप्ताहिक पत्रों को ही राजनीतिक विचारधारा का वाहन बनना पड़ा। वास्तव में उन्नीसवीं शतब्दी में कलकत्ता के भारत मित्र, वंगवासी, सारसुधानिधि और उचित वक्ता ही हिंदी प्रदेश की रानीतिक भावना का प्रतिनिधित्व करते थे। इनमें कदाचित् ष्भारतमित्रष् ही सबसे अधिक स्थायी और शक्तिशाली था। उन्नीसवीं शताब्दी में बंगाल और महाराष्ट्र लोक जाग्रति के केंद्र थे और उग्र राष्ट्रीय पत्रकारिता में भी ये ही प्रांत अग्रणी थे। हिंदी प्रदेश के पत्रकारों ने इन प्रांतों के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया और बहुत दिनों तक उनका स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्तित्व विकसित नहीं हो सका। फिर भी हम अभ्युदय (1905), प्रताप (1913), कर्मयोगी, हिंदी केसरी (1904-1908) आदि के रूप में हिंदी राजनीतिक पत्रकारिता को कई डग आगे बढ़ाते पाते हैं। प्रथम महायुद्ध की उत्तेजना ने एक बार फिर कई दैनिक पत्रों को जन्म दिया। कलकत्ता से कलकत्ता समाचार, स्वतंत्र और विश्वमित्र प्रकाशित हुए, बंबई से वेंकटेश्वर समाचार ने अपना दैनिक संस्करण प्रकाशित करना आरंभ किया और दिल्ली से विजय निकला। 1921 में काशी से आज और कानपुर से वर्तमान प्रकाशित हुए। इस प्रकार हम देखते हैं कि 1921 में हिंदी पत्रकारिता फिर एक बार करवटें लेती है और राजनीतिक क्षेत्र में अपना नया जीवन आरंभ करती है। हमारे साहित्यिक पत्रों के क्षेत्र में भी नई प्रवृत्तियों का आरंभ इसी समय से होता है। फलतः बीसवीं शती के पहले बीस वर्षों को हम हिंदी पत्रकारिता का तीसरा चरण कह सकते हैं।
आधुनिक युग1921 के बाद हिंदी पत्रकारिता का समसामयिक युग आरंभ होता है। इस युग में हम राष्ट्रीय और साहित्यिक चेतना को साथ साथ पल्लवित पाते हैं। इसी समय के लगभग हिंदी का प्रवेश विश्वविद्यालयों में हुआ और कुछ ऐसे कृती संपादक सामने आए जो अंग्रेजी की पत्रकारिता से पूर्णतरू परिचित थे और जो हिंदी पत्रों को अंग्रेजी, मराठी और बँगला के पत्रों के समकक्ष लाना चाहते थे। फलतः साहित्यिक पत्रकारिता में एक नए युग का आरंभ हुआ। राष्ट्रीय आंदोलनों ने हिंदी की राष्ट्रभाषा के लिए योग्यता पहली बार घोषित की ओर जैसे-जैसे राष्ट्रीय आंदोलनों का बल बढ़ने लगा, हिंदी के पत्रकार और पत्र अधिक महत्व पाने लगे। 1921 के बाद गांधी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन मध्यवर्ग तक सीमित न रहकर ग्रामीणों और श्रमिकों तक पहुंच गया और उसके इस प्रसार में हिंदी पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण योग दिया। सच तो यह है कि हिंदी पत्रकार राष्ट्रीय आंदोलनों की अग्र पंक्ति में थे और उन्होंने विदेशी सत्ता से डटकर मोर्चा लिया। विदेशी सरकार ने अनेक बार नए नए कानून बनाकर समाचारपत्रों की स्वतंत्रता पर कुठाराघात किया परंतु जेल, जुर्माना और अनेकानेक मानसिक और आर्थिक कठिनाइयाँ झेलते हुए भी हिन्दी पत्रकारों ने स्वतंत्र विचार की दीपशिखा जलाए रखी।
1921 के बाद साहित्यक्षेत्र में जो पत्र आए उनमें प्रमुख हैं-स्वार्थ (1922), माधुरी (1923), मर्यादा, चाँद (1923), मनोरमा (1924), समालोचक (1924), चित्रपट (1925), कल्याण (1926), सुधा (1927), विशालभारत (1928), त्यागभूमि (1928), हंस (1930), गंगा (1930), विश्वमित्र (1933), रूपाभ (1938), साहित्य संदेश (1938), कमला (1939), मधुकर (1940), जीवनसाहित्य (1940), विश्वभारती (1942), संगम (1942), कुमार (1944), नया साहित्य (1945), पारिजात (1945), हिमालय (1946) आदि।
वास्तव में आज हमारे मासिक साहित्य की प्रौढ़ता और विविधता में किसी प्रकार का संदेह नहीं हो सकता। हिंदी की अनेकानेक प्रथम श्रेणी की रचनाएँ मासिकों द्वारा ही पहले प्रकाश में आई और अनेक श्रेष्ठ कवि और साहित्यकार पत्र कारिता से भी संबंधित रहे। आज हमारे मासिक पत्र जीवन और साहित्य के सभी अंगों की पूर्ति करते हैं और अब विशेषज्ञता की ओर भी ध्यान जाने लगा है। साहित्य की प्रवृत्तियों की जैसी विकासमान झलक पत्रों में मिलती है, वैसी पुस्तकों में नहीं मिलती। वहाँ हमें साहित्य का सक्रिय, सप्राण, गतिशील रूप प्राप्त होता है।
राजनीतिक क्षेत्र में इस युग में जिन पत्रपत्रिकाओं की धूम रही वे हैं -कर्मवीर (1924), सैनिक (1924), स्वदेश (1921), श्रीकृष्णसंदेश (1925), हिंदूपंच (1926), स्वतंत्र भारत (1928), जागरण (1929), हिंदी मिलाप (1929), सचित्र दरबार (1930), स्वराज्य (1931), नवयुग (1932), हरिजन सेवक (1932), विश्वबंधु (1933), नवशक्ति (1934), योगी (1934), हिंदू (1936), देशदूत (1938), राष्ट्रीयता (1938), संघर्ष (1938), चिनगारी (1938), नवज्योति (1938), संगम (1940), जनयुग (1942), रामराज्य (1942), संसार (1943), लोकवाणी (1942), सावधान (1942), हुंकार (1942) और सन्मार्ग (1943), जनवार्ता (१९७२)। इनमें से अधिकांश साप्ताहिक हैं, परंतु जनमन के निर्माण में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा है। जहाँ तक पत्र कला का संबंध है वहाँ तक हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि तीसरे और चैथे युग के पत्रों में धरती और आकाश का अंतर है। आज पत्रसंपादन वास्तव में उच्च कोटि की कला है। राजनीतिक पत्रकारिता के क्षेत्र में आज (1921) और उसके संपादक स्वर्गीय बाबूराव विष्णु पराड़कर का लगभग वही स्थान है जो साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी को प्राप्त है। सच तो यह है कि आज ने पत्रकला के क्षेत्र में एक महान संस्था का काम किया है और उसने हिंदी को बीसियों पत्रसंपादक और पत्रकार दिए हैं।
आधुनिक साहित्य के अनेक अंगों की भाँति हिन्दी पत्रकारिता भी नई कोटि की है और उसमें भी मुख्यतः हमारे मध्यवित्त वर्ग की सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक औ राजनीतिक हलचलों का प्रतिबिंब भास्वर है। वास्तव में पिछले २०० वर्षों का सच्चा इतिहास हमारी पत्रपत्रिकाओं से ही संकलित हो सकता है। बँगला के कलेर कथा ग्रंथ में पत्रों के अवतरणों के आधार पर बंगाल के उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यवित्तीय जीवन के आकलन का प्रयत्न हुआ है। हिंदी में भी ऐसा प्रयत्न वांछनीय है। एक तरह से उन्नीसवीं शती में साहित्य कही जा सकनेवाली चीज बहुत कम है और जो है भी, वह पत्रों के पृष्ठों में ही पहले-पहल सामने आई है। भाषाशैली के निर्माण और जातीय शैली के विकास में पत्रों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, परंतु बीसवीं शती के पहले दो दशकों के अंत तक मासिक पत्र और साप्ताहिक पत्र ही हमारी साहित्यिक प्रवृत्तियों को जन्म देते और विकसित करते रहे हैं। द्विवेदी युग के साहित्य को हम सरस्वती और इंदु में जिस प्रयोगात्मक रूप में देखते हैं, वही उस साहित्य का असली रूप है। 1921 ई. के बाद साहित्य बहुत कुछ पत्रपत्रिकाओं से स्वतंत्र होकर अपने पैरों पर खड़ा होने लगा, परंतु फिर भी विशिष्ट साहित्यिक आंदोलनों के लिए हमें मासिक पत्रों के पृष्ठ ही उलटने पड़ते हैं। राजनीतिक चेतना के लिए तो पत्रपत्रिकाएँ हैं ही। वस्तुतः पत्रपत्रिकाएँ जितनी बड़ी जनसंख्या को छूती हैं, विशुद्ध साहित्य का उतनी बड़ी जनसंख्या तक पहुँचना असंभव है।१९९० के बाद 90 के दशक में भारतीय भाषाओं के अखबारों, हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण आदि के नगरों-कस्बों से कई संस्करण निकलने शुरू हुए। जहां पहले महानगरों से अखबार छपते थे, भूमंडलीकरण के बाद आयी नयी तकनीक, बेहतर सड़क और यातायात के संसाधनों की सुलभता की वजह से छोटे शहरों, कस्बों से भी नगर संस्करण का छपना आसान हो गया। साथ ही इन दशकों में ग्रामीण इलाकों, कस्बों में फैलते बाजार में नयी वस्तुओं के लिए नये उपभोक्ताओं की तलाश भी शुरू हुई। हिंदी के अखबार इन वस्तुओं के प्रचार-प्रसार का एक जरिया बन कर उभरा है। साथ ही साथ अखबारों के इन संस्करणों में स्थानीय खबरों को प्रमुखता से छापा जाता है। इससे अखबारों के पाठकों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है। मीडिया विशेषज्ञ सेवंती निनान ने इसे श्हिंदी की सार्वजनिक दुनिया का पुनर्विष्कार कहा है। वे लिखती हैं, “प्रिंट मीडिया ने स्थानीय घटनाओं के कवरेज द्वारा जिला स्तर पर हिंदी की मौजूद सार्वजनिक दुनिया का विस्तार किया है और साथ ही अखबारों के स्थानीय संस्करणों के द्वारा अनजाने में इसका पुनर्विष्कार किया है।
1990 में राष्ट्रीय पाठक सर्वेक्षण की रिपोर्ट बताती थी कि पांच अगुवा अखबारों में हिन्दी का केवल एक समाचार पत्र हुआ करता था। पिछले (सर्वे) ने साबित कर दिया कि हम कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं। इस बार (२०१०) सबसे अधिक पढ़े जाने वाले पांच अखबारों में शुरू के चार हिंदी के हैं। एक उत्साहजनक बात और भी है कि आईआरएस सर्वे में जिन 42 शहरों को सबसे तेजी से उभरता माना गया है, उनमें से ज्यादातर हिन्दी हृदय प्रदेश के हैं। मतलब साफ है कि अगर पिछले तीन दशक में दक्षिण के राज्यों ने विकास की जबरदस्त पींगें बढ़ाईं तो आने वाले दशक हम हिन्दी वालों के हैं। ऐसा नहीं है कि अखबार के अध्ययन के मामले में ही यह प्रदेश अगुवा साबित हो रहे हैं। आईटी इंडस्ट्री का एक आंकड़ा बताता है कि हिन्दी और भारतीय भाषाओं में नेट पर पढ़ने-लिखने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है।मतलब साफ है। हिन्दी की आकांक्षाओं का यह विस्तार पत्रकारों की ओर भी देख रहा है। प्रगति की चेतना के साथ समाज की निचली कतार में बैठे लोग भी समाचार पत्रों की पंक्तियों में दिखने चाहिए। पिछले आईएएस, आईआईटी और तमाम शिक्षा परिषदों के परिणामों ने साबित कर दिया है कि हिन्दी भाषियों में सबसे निचली सीढियों पर बैठे लोग भी जबरदस्त उछाल के लिए तैयार हैं। हिन्दी के पत्रकारों को उनसे एक कदम आगे चलना होगा ताकि उस जगह को फिर से हासिल सकें, जिसे पिछले चार दशकों में हमने लगातार खोया।
राजनीति कि रिपोर्टिंग समाचार -पत्र राजनीतिक समाचारों को पत्र में अधिकांश जगह देते हैं,संभव है कि कुछ अंशो में यह टीका ठीक भी हो, किन्तु यह भी एक ठोस तथ्य है कि राजनीति ऊपर से नीचे तक आम जनजीवन में इतनी अधिक छा गयी है कि इसके बिना समाचारों कि अपेक्षा भी नहीं कि जा सकती। प्रश्न यह नहीं है कि राजनीती का जीवन मैं बहुत अधिक छा जाना उचित है या अनुचित। संवाददाता के लिए तो यह आवश्यक है कि जो राजनीति आज है, उसे अपने समाचार में उसके वास्तविक रूप में प्रस्तुत करें। पुरे भारत में आज राजनीति के अखाड़े बन गए हैं। सभी स्तरों कि भांति शहरों तथा गांव में राजनैतिक दलबन्दी तथा दलों की आंतरिक गुटबंदी रहती है। राजनैतिक दलों कि बैठकें तो समय-समय पर औपचारिक ढंग से होती है, जिनमे लिए गए निर्णयों तथा निर्धारित कार्यक्रमों कि अधिकृत तौर पर घोषणा की जाती है। इसके समाचार संवाददाता को प्राप्त हो हि जाते हैं। इन समाचारों में रोचकता तब आती है जब उनमे राजनैतिक दलों कि बैठकों में हुई आंतरिक नोंक-झोंक, घात-प्रत्याघात, विवाद आदि का उल्लेख किया जाए। संवाददाता के लिए अत्यंत आवश्यक है कि दलबन्दी तथा गुटबंदी से प्रभावित नहीं हो। उसे इन बैठकों के अथवा दलबन्दी तथा गुटबंदी के किसी भी प्रकार के समाचार देते समय यह सतर्कता तो रखनी ही चाहिए कि समाचार रोचक तथा पठनीय होने के साथ ही किसी दल विशेष या गुट विशेष कि स्तुति या निन्दा करने वाला नहीं रहे। राजनैतिक नेता अपनी दलिय बैठकों के अतिरिक्त अन्य गतिविधियों में भी सक्रिय रहते है। प्रायः नित्य विभिन्न गुटों के लोग आपस में मिलते रहते है। उनके विचार-विमर्श का विषय राष्ट्रीय तथा प्रादेशिक से लेकर स्थानीय घटनाएँ तथा हलचलें भी रहती है। इस बीच संवाददाताओं के लिए यह तो संभव नहीं रहता कि वह प्रतिदिन विभिन्न दलों तथा गुटों के नेताओं से मिले, क्यूंकि यह संवाददाता पूर्णकालीन पत्रकार नहीं रहता। संवाददाता को अपनी व्यवहार कुशलता से सबकी इतनी सदभावना तथा विश्वास प्राप्त करना पड़ता है कि कोई भी विशेष घटना घटे तो उसे उसका संवाद तुरंत मिल जाए।
कुछ संवाददाता ऐसे भी होते है जो किसी न किसी राजनैतिक दल के सदस्ये रहते है तथा गुटबाजी में लिप्त रहते हैं उन्हें यह सलाह तो नहीं दी जा सकती कि वे दलबन्दी या गुटबाजी के पृथक हो जाएं लेकिन संवाददाता होने के नाते उनसे यह अपेक्षा की जाती है की वे अपने समाचारों को अपने दलिये तथा गुटिये दृष्टिकोण से मुक्त रखें तथा अपने विपक्षी दल या गुट के समाचारों को भी पर्याप्त स्थान अपने समाचारो में दें।
शहरों तथा गांव के संवाददाता को राष्ट्रीय तथा प्रादेशिक घटनाचक्र के साथ ही साथ अपने अंचल,संभाग तथा जिले के घटनाचक्र के प्रति पूर्णतः जागरुक रहना पड़ता है। किसी निर्णय की घोषणा, कोई आन्दोल, जनजीवन को प्रभावित करने वाली कोई घटना, कोई प्राकृतिक प्रकोप दुर्घटना, संक्रामक रोग का फैलना आदि। इन घटनाओं पर सत्तारूढ़ दल तथा विरोधी दल के प्रमुख नेताओं कि तत्काल प्रतिक्रिया प्राप्त कर उसी दिन संक्षिप्त समाचार प्रेषित करना संवाददाता की जागरूकता प्रदर्शित करता है। राजीव गांधी की हत्या समूचे भारत के लिए एक जबरदस्त आघात था। भारत के हर कोने कोने में उसकी प्रतिक्रिया हुई, मोटे तौर पर शहरों तथा गांव के संवाददाताओं द्वारा राजीव गांधी की हत्या पर जनसाधारण पर हुई प्रतिक्रिया के समाचार तत्परतापूर्वक दिए गए थे। किसी भी नेता के निधन पर उस स्थल में हुई शोकसभा में दी जाने वाली श्रद्धांजलि अथवा शोकशभा न होने पर विभिन्न दलों के प्रमुख नेताओं के शोक सन्देश संवाददाता के होते हैं। यदि नेता ने कभी पूर्व में घटनाओ की यात्रा कि हो तो तब कि कोई घटना भी समाचार को रोचक बनाती है।
चुनाव के समय पत्रकारों की महत्वपूण भूमिका रहती है. अगर हम निर्वाचन अधिकारीयों, अन्य विभिन्न सरकारी अधिकारियों तथा कर्मचारियों से निष्पक्षता की उम्मीद करते है और जहाँ वह नहीं होती वहां उसकी आलोचना करते है, तो ये रिपोर्टर का दायित्व है कि हम भी निष्पक्षता की अपेक्षा को अपने स्तर पर पूरा करें। चुनाव के मौकों पर अखबार और रिपोर्टर की प्रतिष्ठा दांव पर लगी होती है। एक संवाददाता के रूप में विश्वश्नीयता की सबसे बड़ी परीक्षा तभी होती है और उस परीक्षा में सफल हो कर निकलते हैं तो न केवल इससे हमारे अखबार की बल्कि रिपोर्टर की भी प्रतिष्ठा बढ़ती है। अंततः एक अखबार की प्रतिष्ठा बहुत हद तक उसके संवाददाताओं की प्रतिष्ठा से बनती है।
रिपोर्टर को राजनीति की रिपोर्टिंग करते वक्त बहुत सावधानी बरतनी चाहिए यदि उससे कोई भूल हो जाती है तो वह नुकसानदेह साबित हो सकती है। उसका प्रमाद उसके छवि को घूमिल कर सकता है। इसीलिए विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त तथ्यों के आधार पर रिपोर्ट तैयार करते समय रिपोर्टर को अपनी ओर से ऐसा कुछ नहीं लिखना चाहिए जिससे किसी व्यक्ति या पार्टी की प्रतिष्ठा पर आंच आए या कोई निरपराधी दंड पा जाए। इसी विषेय में कई बार राजनीति उठा पाठक में लोग खुद की गलती को छुपाने का प्रयास करते हैं, बल्कि रिपोर्टर उसके भृमात्मक या अंतर्विरोधी बयानों के आधार पर सत्यान्वेषण में लगना चाहिए और उसे कोई न कोई ऐसा सूत्र हाथ लग ही जाए जिससे वास्तविकता का पता चल जाए।
राजनीति में आज कल ऐसा बहुत देखने को मिलता है कि घटना के समय संबंधित साक्ष्यों को या तो गायब कर दिया जाता या घटना से संबंधित साक्ष्य देने वाले बयान देने की स्थिति में ही नहीं होते। भाषण रिपोर्टिंग का एक एहम हिस्सा है। मीडिया के हर समाचार माध्यम में कोई न कोई समाचार भाषण-आधारित होता ही है। भाषण से तात्पर्य सिर्फ नेता द्वारा सार्वजनिक सभा में दिया गया वक्तव्य नहीं हैं, बल्कि इसका अभिप्राय संगोष्ठी,अधिवेशन,संसद,विधानसभा आदि मे कही गई बातें या व्यक्त किए गए विचार हैं। इन विचारों के महत्वपूर्ण होने पर रिपोर्टर इन्हे अपनी रिपोर्ट में शामिल करता है। प्रायरू महत्वपूर्ण व्यक्ति द्वारा कही गई बातों को ही रिपोर्ट में जगह दी जाती है। रिपोर्टर संगोष्ठी-सेमिनार अधिवेशन,संसद आदि में दिए गए भाषणों को ध्यान से सुनता है और फिर उनमे से सर्वाधिक महत्वपूण बात या विचार को इंट्रो में शामिल करता है। रिपोर्टर के लिए जरूरी नहीं कि वह किसी व्यक्ति की बातों को उसी की शब्दावली में लिखे। उसे उन बातों को अपनी भाषा में लिखने की पूरी छूट होती है, लेकिन ऐसा करते समय उसे ध्यान रखना पड़ता है कि किसी व्यक्ति के विचार उसकी भाषा में आकर बदल तो नहीं गए। भाषणों की रिपोर्टिंग के टेप रिकॉर्डर का प्रयोग बहुत अछा होता है। इससे यह सुविधा होती है कि रिपोर्टर सारी बातो को एक बार फिर सुन सकता है जिससे किसी महत्वपूण बात के छूटने की सम्भावना कम होती है या वक्ता के भाव बदल जाने की संभावना कम होती है।
रिपोर्टर को सभा या सेमिनार-स्थल पर जाकर आयोजकों से यह पता कर लेना पड़ता है कि आमंत्रित वक्ता जो विचार व्यक्त करने वाले है, उसकी कोई कॉपी मौजूद तो नहीं है। यदि उसे भाषण की प्रति मिल जाती है तो भी रिपोर्टर को वहां पुरे समय तक उपस्थित रहना पड़ता है, क्योंकि कई वक्त भाषण की कॉपी में व्यक्त विचारों के अलावा भी कुछ नई और महत्वपूर्ण बाते बोल जाते है। रिपोर्टर को उस कॉपी और भाषण में मिलान करके उनके महत्वपूर्ण बिंदुओं को रेखांकित कर लेना होता है और फिर क्रमशरू अतिमहत्वपूर्ण, महत्वपूर्ण बातों को अपनी रिपोर्ट में लिख लेना चाहिए। वास्तव में ये सब कुछ रिपोर्टर के विवेक पर निर्भर करता है की वह सभा-सेमिनार में व्यक्त किए गए विचारों में से किसको सर्वाधिक महत्व देता है। रिपोर्टर महत्वपूर्ण व्यक्ति द्वारा कही गई सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात को ज्यों का त्यों शीर्षक के रूप में इस्तेमाल करता है और उसके आगे वक्ता का नाम दे देता है भाषणो की रिपोर्टिंग दायित्वपूण कार्ये है, इसीलिए रिपोर्टर को वक्ता की बात को तोड़-मोड़ कर पेश नहीं करना चाहिए। इससे विवाद उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है। रिपोर्टर को राजनीति की रिपोर्टिंग करते वक्त बहुत सावधानी बरतनी चाहिए यदि उससे कोई भूल हो जाती है तो वह नुकसानदेह साबित हो सकती है।
उसका प्रमाद उसके छवि को घूमिल कर सकता है। इसीलिए विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त तथ्यों के आधार पर रिपोर्ट तैयार करते समय रिपोर्टर को अपनी ओर से ऐसा कुछ नहीं लिखना चाहिए जिससे किसी व्यक्ति या पार्टी की प्रतिष्ठा पर आंच आए या कोई निरपराधी दंड पा जाए। इसी विषेय में कई बार राजनीति उठा पाठक में लोग खुद की गलती को छुपाने का प्रयास करते हैं, बल्कि रिपोर्टर उसके भृमात्मक या अंतर्विरोधी बयानों के आधार पर सत्यान्वेषण में लगना चाहिए और उसे कोई न कोई ऐसा सूत्र हाथ लग ही जाए जिससे वास्तविकता का पता चल जाए। राजनीति में आज कल ऐसा बहुत देखने को मिलता है कि घटना के समय संबंधित साक्ष्यों को या तो गायब कर दिया जाता या घटना से संबंधित साक्ष्य देने वाले बयान देने की स्थिति में ही नहीं होते।
जो रिपोर्टर राजनीति कि रिपोर्टिंग करता है तो उस में मिलनसारिता, क्षिप्रकारिता,और कल्पना शक्ति का होना परम आवश्यक है एक रिपोर्टर को यह नहीं भूलना चाहिए के वह जब राजनीति कि रिपोर्टिंग करता है तो वह लोकतंत्र कि रिपोर्टिंग कर रहा होता है। राजनीति रिपोर्टिंग हर पत्रकार के बस कि बात नहीं इसके लिए कुशल और दक्ष पत्रकारों की जरूरत पड़ती है।
इसीलिए समाचार-पत्र या समाचार समितियां किसी पत्रकार को उसकी विशेषज्ञता के आधार पर ही राजनीति की रिपोर्टिंग के लिए भेजती है। एक रिपोर्टर को राजनैतिक,गतिशील मुद्दों के बारे में विकट सोच होनी चाहिए, राजनीति से जुडी खबरों के बारे में स्वाभाविक बुद्धि हो,रिपोर्टिंग में स्पष्ट लेखन शैली जो ध्यान आकर्षित कर सके और एक सूक्षम अंतर पैदा कर सके, समय सीमा को ध्यान में रखते हुए प्रभावी ढंग से संचालित करने की क्षमता हो। आज इस भाग का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में है की वह सरकार के औपचारिक कामकाज के बारे में नागरिको को सूचित करे। संभावित लापरवाही और दुरूपयोग पर एक प्रहरी के रूम में सेवा करे।

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अनुराग श्रीवास्तव विचारपरक के पत्रकार है |

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