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जीरे के प्रमुख रोग व उनका प्रबन्धन

(विचारपरक प्रतिनिधि द्वारा)
सिद्धार्थनगर 15 मार्च, विभिन्न बीजीय मसाला फसलो में जीरा अल्पसमय में पकने वाली प्रमुख नकदी फसल है। जीरे के दानो में पाये जाने वाले वाष्पशील तेल के कारण ही इनमें जायकेदार सुगंध होती है। इसी सुगन्ध के कारण जीरे का मसालो के रूप में उपयोग किया जाता है।
आज यहां यह जानकारी देते हुए एक कृषि वैज्ञानिक ने बताया है कि जीरे में यह विशिष्ट सुगंध क्यूमिनाॅल या क्यूमिन एल्डीहाइड के कारण होती है। इसका उपयोग मसाले के अलावा औषधि के रूप में भी होता है। जीरे में मूत्र वर्धक, वायुनाशक व अग्निदीपक गुण पाये जाते है। इन गुणो के कारण कई देशो में आयुर्वेदिक दवाओ में जीरे का उपयोग बढ़ता जा रहा है। भारत में जीरे की खेती अधिक नमी वाले क्षेत्रो को छोड़कर देश के सभी राज्यों में की जाती है। जीरे के कुल क्षेत्र व उत्पादन का लगभग 90 प्रतिशत भाग राजस्थान व गुजरात के अन्र्तगत आता है। देश के कुल उत्पादन का 48 प्रतिशत जीरा राजस्थान में होता है।
जीरे के रोग एवं रोकथाम जीरे का छाछया या चूर्णिल आसिता रोग यह रोग एरीसीफी पोलीगोनी नामक कवक से होता है। इस रोग की प्रारम्भिक अवस्था में पौधो की पत्तियों व टहनियों पर सफेद चूर्ण नजर आता है। धीरे-धीरे सफेद चूर्ण पूरे पौधे पर ही फैल जाता है, जिससे पौधे की वृद्धि रूक जाती है। रोगी फसल में बीज बनते ही नही बनते है, तो कम व हल्के बीज बनते है। प्रारम्भिक अवस्था में रोग आने पर पूरी फसल नष्ट हो जाती है तथा देरी से आने पर बीजो की विपणन गुणवत्ता पूर्णतया कम हो जाती है।
कृषि वैज्ञानिक ने यह भी बताया है कि रोकथाम रोग केलक्षण दिखने पर 15-20 किलोग्राम गंधक पूर्ण प्रतिहेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। डायनोकेप 1 प्रतिशत का पर्णीय छिड़काव रोग के लक्षण दिखाई देने पर करना चाहिए तथा 10-15 दिन के अन्तराल से छिड़काव या भूरकाव दोहराया जा सकता है। जीरे में उकठा रोग फ्यूजेरियम ओक्सीस्पोरम स्र्पी क्यूमिनी नामक कवक से होता है। रोग से ग्रसित पौधे हरे अवस्था में ही मुरझा कर सूख जाते है। इस रोग का आक्रमण पौधो की किसी भी अवस्था में हो सकता है, परन्तु फसल की प्रारम्भिक अवस्था में अधिक होता है।
यह रोग पौधो की जड़ो में लगता है, इसकी पूर्णतया रोकथाम कठिन है। रोकथाम-रोग के संक्रमण को कम करने के लिए द्वि अर्धकालीन वर्ष का फसल चक्र अपनाएं। स्वस्थ व रोग रहित बीजो को बाॅविस्टीन या एग्रोसेन जी एन दवा से 2 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें। खेत की गर्मियो में मई-जून के महीनो में गहरी जुताई कर खुला छोड़ दे। मृदा में जैव नियन्त्रण ट्राइकोडर्मा वीरिडी, ट्राइकोडर्मा हरजीयनम का प्रयोग का रोग जनक की बृद्धि को रोका जा सकता है। इस रोग से कम प्रभावित होने वाली किस्मो की बुवाई करनी चाहिए। जैसे-आर0एस0 1. आर0 जेड-209, एम.सी.-43, गुजरात जीरा-1 आदि।
झुलसा रोग (अल्टरनेरिया ब्लाइट)
यह रोग अल्टरनेरिया बोन्रिसी नामक कवक द्वारा होता है। झुलसा रोग के प्रकोप से प्रभावित पौधों पर भूरे-कालें धब्बे दिखाई देते है जो बाद में गहरे काले धब्बे दिखाई देते है । फसल में फूल आने वाली अवस्था में अगर आकाश से बादल छाये रहे, तो इस रोग का प्रकोप बढ़ जाता है। इस रोग से ग्रसित पौंधो की उपज व गुणवत्ता में कमी आ जाती है। नियन्त्रण-मेन्कोजेब 2 प्रतिशत का छिड़काव तुरन्त करना चाहिए। आवश्यकतानुसार छिड़काव 15 दिन से दोहरावें। मेन्कोजेब 2 प्रतिशत$अजाडिरेक्टीन 0.3 प्रतिशत का छिडकाव बुवाई के 40-45 दिनों के बाद करने से रोग को रोका जा सकता है। प्रोपीकोनाजोल, आईप्रोडिओन$कार्बेडाजिम कवक नाशी का पर्णीय छिड़काव झुलसा रोग की रोकथाम में उपयोग पाया गया है।

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अनुराग श्रीवास्तव विचारपरक के पत्रकार है |

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