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गांवो में खलिहानो का वजूद खत्म हो रहा है

(विचारपरक प्रतिनिधि द्वारा)
डुमरियागंज (सिद्धार्थनगर) 17 अप्रैल, डुमरियागंज तहसील क्षेत्र के गांवो में धीरे-धीरे खलियानो का वजूद खत्म हो रहा है इन्सान सुविधाओं के पीछे भागता है। जहां जिस ओर सुविधाएं दिखी उसी ओर चल निकलता है।
पहले खेत और खलिहान का नाम एक साथ लिये जाते थे पर अब आधुनिकरण, मशीनीकरण या फिर सुविधाएं के चहते खेत तो रह गये खलिहान समाप्त होते चले गये। इसके कई कारण हैं मजदूरों की कमी, समयाभाव, मशीनीकरण।
आज यहा यह जानकारी देते हुए सरकारी सूत्रो ने बताया है कि खलिहान, जिसे बाड़ा भी कहा जाता है। जिसमें पशु मवेशी, खेती के औजार और कटी हुई फसल को रखा जाता है।
आमतौर पर खलिहान बारिश, बर्फ, धूप और आंधी से सुरक्षा के लिये किसी कच्ची या पक्की छत से ढके हुए होते है। भारतीय उपमहाद्वीप की लोक-संस्कृति में खलिहान की छवि का बहुत महत्व है। अगर किसी के जीवन में बहुत धन-दौलत है तो कहा जाता है कि उसके अम्बार भरे हुए है जो उस कृषि जीवनी की तरफ इशारा है। जिसमें अनाज और जानवर से भरे खलिहान ही धन सम्पति का संकेत थे।
खलिहान में नई फसल के लिए कुछ धार्मिक अनुष्ठान भी किये जाते थे। इसके बाद ही किसान अनाज घर ले था पर वर्तमान में आधुनिकता के कारण किसान जिस खेत में फसल है उसकी कटाई करने के बाद वहीं उसकी दवरी भी कर ले रहा है।
जिसके कारण धीरे-धीरे खलिहान भी समाप्त हो गए है। कुछ दिनो में खलिहान शब्द सिर्फ स्मृतियों में ही शेष रह जायेगा ।

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अनुराग श्रीवास्तव विचारपरक के पत्रकार है |

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