आज की ताजा खबर

गंगा के औषधीय गुणों पर अध्ययन पूरा

(विचारपरक प्रतिनिधि द्वारा)
नई दिल्ली 23 जून, पौराणिक काल से ब्रम्हा द्रव्य के रूप में प्रचलित गंगा नदी के औषधीय गुणो एवं प्रवाह मार्ग पर जल के स्वरूप एवं इससे जुड़े विभिन्न कारको एवं विशेषताओं का पता लगाने के लिए सरकार द्वारा शुरू कराया गया अध्ययन कार्य पूरा हो चुका है और इसकी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी गई है। यह अध्ययन राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग शोध संस्थान (नीरी) ने किया है।
जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने कहा , गंगा नदी में औषधिय गुण है जिसके कारण इसे ब्रम्हा द्रव्य कहा जाता है और जो इसे दूसरी नदियों से अलग करता है।
यह कोई पौराणिक मान्यता का विषय नही है, बल्कि इसका वैज्ञानिक आधार है। इस बारे में नीरी ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है।
उन्होने कहा अब हम इसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में अध्ययन कर रहे है। केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि गंगा नदी औषधीय गुणों एवं प्रवाह मार्ग से जुडे कारणो के अध्ययन का दायित्व राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियर शोध संस्थान नीरी को दिया गया था। इसके लिए तीन मौसमों के अध्ययन की जरूरत थी और इसके उपरांत संस्थान ने अपनी रिपोर्ट पेंश कर दी है।
इस अध्ययन को केन्द्र को तीन चरणो में पूरा करना था, जिसमें शीतकालीन, पूर्व मानसून और उत्तर मानसून मौसम में गंगा नदी के 50 से अधिक स्थलों पर नमूनो का परीक्षण किया गया है। इस अध्ययन एवं अनुसंधान परियोजना को पंद्रह महीनो में पूरा किया जाना था। इस अध्ययन में गंगा जल के विशेष गुणधर्मों के स्त्रोतो को पहचानने की प्रक्रिया थी।
इसी तरह नदी के पानी में मिलने वाले प्रदूषित जल के अनुपात से होने वाले दुष्परिणामो का पता लगाना भी एक हिस्सा था।
उमा भारती ने कहा कि गंगा नदी के औषधीय गुणो के बारे में वरिष्ठ शिक्षाविद्र प्रो0 भार्गव का सिद्धांत भी है। केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि इसके पीछे यह कारण बताया गया है कि हिमालयी क्षेत्र औषधिया पादपों से भरा हुआ है जो शीत ऋतु में वर्फ से दब जाते है। बाद में बर्फ पिघलने के बाद ये औषधियां पानी के साथ गंगा नदी में मिल जाती है। इस अध्ययन में इस बात का भी पता लगाने का प्रयास किया गया कि गंगा नदी के जल में औषधिया गुण मौजूद है या धीरे-धीरे खत्म हो रहे है। इसके अलावा गदंगी एवं जलमल के प्रवाह से जुडे विषयांे का भी अध्ययन किया गया। इसमें गोमुख से गंगा सागर तक जल प्रवाह से जुडे तत्वों का भी अध्ययन किया जा रहा है। इसके तहत टिहरी से पहले और नरौरा के बाद कानपुर से पहले और कानपुर के बाद, पटना से पहलें और पटना के बाद पानी के स्वरूप में बदलाव पर विचार किया गया।
जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय का कहना है कि इस पवित्र नदी में प्रत्येक वर्ष अनेक धार्मिक अवसरों पर करोडो लोगो द्वारा डुबकी लगाने के बावजूद इस नदी से कोई बीमारी या महामारी नही फैलती है इसका कारण इस नदी के जल में अपने आप सफाई करने के कोई अद्भुत शक्ति है जो इसके पानी से सड़न को रोकती है। इस अध्ययन से गंगा जल का उसके विशिष्ट गुणो के कारण मानव जाति के कल्याण और स्वास्थ्य के लिए उपयोग करने में मदद मिलेगी। इस विषय पर ब्रिटिश जीवाणु विशेषज्ञ अर्नेस्ट हेनबरी हेन्किन के संदर्भो का हवाला दिया जाता है जिनके अनुसार इस नदी के जल में जीवाणुभोजी गतिविधियों की उपस्थिति का बहुत पहले ही पता चल चुका है।

About The Author

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Enter the text from the image below