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किसान मूंग की खेती करके अधिक लाभ उठाएं – डा0 मारकण्डेय

आलोक कुमार श्रीवास्तव
विचारपरक संवाददाता
सिद्धार्थनगर 23 फरवरी, कृषि वैज्ञानिक डा0 मारकण्डेय ने कहा कि मूंग की खेती कम समय में अधिक लाभ देने के साथ मूंग पोष्टिकता से भरपूर होने के कारण नाइट्रोजन फिक्सेशन गुणो के कारण यह भूमि के लिए संजीवनी का काम करती है। मूंग की फसल 60 से 70 दिन में तैयार हो जाती है। इसमें 10 से 12 कुन्तल प्रति हेक्टेयर उपज संभव है। जहां तक लाभ की बात है तो पैदावार के समय मूंग प्रति कुन्तल का दाम 5500 रूपये के आसपास होता है। धान, गेहूॅ की फसल के अपेक्षा यह कम समय में अधिक लाभ देती है।
आज यहां ‘‘विचारपरक’’ से बात-चीत में यह विचार कृषि विज्ञान सोहना के वैज्ञानिक डा0 मारकण्डेय ने व्यक्त करते हुए उन्होने किसानो से अपील किया कि कम समय में अधिक लाभ कमाने के लिए किसान मूंग की खेती करें। उन्होने कहा कि मूंग के दाने में 25 फीसदी प्रोटीन , 60 फीसदी कार्बोहाइड्रेड व 1.3 फीसदी वसा मिलती है। इस कारण यह खुद में एक पौष्टिक व संतुलित आहार है। अपने विविध रूप में यह भूमि के लिए संजीवनी का काम करती है। मूंग की जड़ो में नाइट्रोजन फिक्शेसन का गुण होता है। अपनी फसल के लिए नेत्रजन की कमी की काफी हद तक भरपाई हो जाती है। पूर्वांचल के सघन खेती क्षेत्र में मूंग का क्षेत्रफल ग्रीष्मकालीन फसल के रूप में बढ़ रहा है। मूंग के लिए गर्म जलवायु, वार्षिकी वर्षा 60 से 75 सेन्टीमीटर अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है। अम्लीय तथा क्षारीय भूमि इसकी खेती के लिए अनपयुक्त है। इसकी बुवाई 15 मार्च से 15 अप्रैल तक करना उपयुक्त होता है। अच्छी पैदावार के लिए बीज दर 25 से 30 किग्रा प्रति हेक्टेयर रखते है। बुवाई बीज शोधन के उपरान्त ही करनी चाहिए। बीज शोधन राइजोबीयम कल्चर तथा फास्फेट आलबुलाईजिंग बैक्टेरिया, पी0एस0बी0के0 द्वारा करते है। राइजोबीयम कल्चर जहां दलहनी फसलो की ग्रन्थियों के विकास में सहायक होकर वायुमंडलीय नाइट्रोजन को संरक्षित करने में मदद करता है। वही पी0एस0बी0 उपलब्ध फास्फेट को उपलब्ध फास्फेट में परिवर्तित करता है। मूंग की बुवाई 5 संेटीमीटर की गहराई पर पंक्ति की दूरी 20 सेंटीमीटर की गहराई पर , पंक्ति से पंक्ति की दूरी 20 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर पर करनी चाहिए।
अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए नत्रजन 15 से 20 किग्रा फास्फोरस , 40 से 60 तथा 30 से 40 किग्रा , प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए। सिंह ने कहा कि मंूग की सिचाई भूमि के किस्म, तापमान तथा हवाओ के तीव्रता पर निर्भर करता है। इसकी कम से कम 3 से 4 बार सिंचाई करनी चाहिए पहली सिंचाई बुवाई के 25 से 30 दिन बाद और फिर बाद में 10 से 15 दिन के अन्दर से आवश्यकतानुसार की जानी चाहिए। यदि पहली सिंचाई जल्दी कर दें तो ग्रन्थियों के विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। फूल आने से पहले तथा दाना पड़ते समय सिंचाई आवश्यक है। खर पतवारो का रसायनिक नियंत्रण पैन्डीमैथलीन 30 ई0सी0के0 3.3 लीटर अथवा एलाक्चोर 50 ई0सी0 के 3 लीटर को 600 से 700 लीटर पानी में घोलकर जमाव से पहले छिड़काव कर दे। इसकी उन्नतिशील प्रजातियां पंत मूंग-एक, पंत मूंग दो, सम्राट नरेन्द्र मंूग एक, जेड0पी0 44 आदि है।

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अनुराग श्रीवास्तव विचारपरक के पत्रकार है |

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