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कथा के आयोजन से वातावरण भक्ति मय हो जाता है

(विचारपरक प्रतिनिधि द्धारा)
सिद्धार्थनगर 5 मार्च , श्रीराम और भरत जैसे भाई हर घर मे हो जाये तो पृथ्वी स्वर्ग बन जाये,कथा के आयोजन से वातावरण शुद्ध होजाता है और वहां भक्ति मय हो जाता है जिस तरह हंस जल में मिले दूध को ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार विद्वान छोटे से छोटे वक्ता को सुनकर अच्छी बातें ग्रहण कर लेता है, और बुरी बातों को अपने मन से निकाल देता है,कथा का रस पान करने से जीवन धन्य हो जाता है।
उक्त विचार कथा व्यास पारसमणि जी महाराज ने व्यक्त किया। आज बांसी तहसील क्षेत्र के उसकी शुक्ल स्थित बाग में आयोजित श्री सीताराम शिवार्चन ज्ञान महायज्ञ एवं संगीतमयी श्रीराम कथा के दूसरे दिन कथा प्रवचन कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि राम कथा कहने वाला वक्ता छोटा बड़ा नही होता है। तुलसीदास जी ने मानस में कहा है कि एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए।। अर्थात एक बार प्रयाग में समस्त मुनि मकर नहाकर अपने अपने आश्रम को चले गए। लेकिन भरद्वाज जी ने ऋषि याज्ञवल्क्य जी को चरण पकड़कर रोक लिया, और अपने मन के संदेह को मिटाने के लिए पूंछा कि राम के नाम का बहुत महत्व है। वह कौन राम हैं। क्या वह राम दशरथ नन्दन हैं, जो वन गमन में सीताहरण होने पर विलाप कर रहे थे, और उसी नाते रावण का वध कर दिया। या कोई और राम हैं। ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा तुम बड़े चतुर हो। सब जानते हो फिर भी राम कथा सुनकर रहस्य जानना चाहते हो। तो सुनो! एक बार त्रेता युग में सती जी के साथ शिव जी राम कथा सुनने कुंभज ऋषि के यहां पहुंचे। जहां ऋषि ने सती व शिव जी को प्रणाम किया, और शिव जी के कहने पर वे व्यास पीठ पर बैठे और जमीन पर बैठकर सती व शिव जी कथा सुनने लगे। सती जो को अटपटा लगा, और शिव जी से वे पूंछ बैठीं कि यह हमें प्रणाम कर रहे हैं, और खुद हमसे ऊंचे आसन पर आसीन होकर कथा सुना रहे हैं।
जिसपर शिव जी ने कहा राम कथा कहने वाला छोटा हो या बड़ा उसे ऊंचा आसन पर बैठने का विधान है, और सुनने वाले को नीचे ही बैठना पड़ता है। वक्ता कभी छोटा नही होता है। कथा व्यास जी ने आगे कहा कि गुरु से दुराव कर ग्रहण की गई शिक्षा किसी भी काम की नही होती है। कर्ण ने परशुराम जी से अपनी पहचान छुपाकर शिक्षा प्राप्त किया था। वह एक बार गुरु परशुराम के चरणों को दबा रहा था, कि उन्हें निद्रा आ गई। उसी दौरान एक कीड़ा कर्ण के पैर में काटने लगा। गुरु की निद्रा भंग न हो वह हिला तक नही। जब गुरु जगे तो देखा कर्ण के पैर में बड़ा घाव हो चुका था, और रक्त बह रहा था। गुरु ने कहा कि तुम ब्राम्हण पुत्र नही हो सकते। इतनी क्षमता सिर्फ क्षत्रिय पुत्र में हो सकती है। कर्ण ने उन्हें तब अपना असली परिचय दिया। लेकिन गुरु ने उसे श्राप दिया कि मेरे द्वारा दी गई विद्या जब तुम्हे जरूरत पड़े नाकाम हो जाएगी। कथा से पूर्व सुबह के समय अयोध्या से आये आचार्य प्रदीप शास्त्री व रुद्रा शास्त्री, अजय शास्त्री, अभय शास्त्री के वेद मंत्रों ने माहौल को पूरी तरह भक्ति मय बना दिया। मुख्य यजमान श्याम शुक्ल, अष्टभुजा शुक्ल व यज्ञ संचालकध्ग्राम प्रधान चंद्रपाल शुक्ल ने पूजन अर्चन में सहभागिता किया। कथा व्यास के साथ बाद्य यंत्र पर श्रीकांत मिश्र, कन्हैया सिंह, अभिषेक मिश्र व दयाशंकर पांडेय ने संगत किया। कथा में उक्त के अलावा सुरेंद्र शुक्ल, रामदेव शुक्ल, प्रदीप शुक्ल, पवन, संतलाल अग्रहरि आदि सहित काफी संख्या में श्रोतागण शामिल थे।

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अनुराग श्रीवास्तव विचारपरक के पत्रकार है |

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