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आज से पवित्र रमजान माह शुरू

(विचारपरक प्रतिनिधि द्वारा)
बस्ती 27 मई, रमजान इस्लामी कैलेण्डर का नवा महीना है, मुस्लिम समुदाय इस महीने को परम पवित्र मानता है। इस मास की विशेषताएं महीने भर के रोजे (उपवास) रखना, राम में तराबीह की नमाज पढ़ना, कुरान्त तिलावत (पारायण) करना, एतेकाफ बैठना, यानी गांव और लोगो की अभ्युन्नती व कल्याण के लिये अल्लाह से दुआ (प्रार्थना) करते हुए मौन व्रत रखना, जकात देना दान धर्म करना अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए इस महीने के गुजरने के बाद शब्बाल की पहली तारीख को ईद उल-फित्र मनाते है। कुल मिलाकर पुण्य कार्य करने को प्राधान्यता दी जाती है। इसी लिये इस मास को नेकियों और इबादतो का महीना यानी पुण्य और उपासना का मास, माना जाता है।
रमजान और कुरान का अवतरण , मुस्लमानो के विश्वास के अनुसार इस महीने की 7वी रात शब-ए-केन्द्र को कुरान का नुजूल (अवतरण) हुआ। इसी लियें, इस महीने में कुरान ज्यादा पढ़ना पुण्यकार्य माना जाता है। तरावीह की नमाज में महीना भर कुरान का पठन किया जाता है। जिस से कुरान पढ़ना न आने वालों को कुरान सुनने का अवकाश जरूर मिलता है।
रमजान और उपवास रोजा रमजान का महीना कभी 9 दिन का तो कभी 30 दिन का होता है। इस महीने में उपवास रखते है। उपवास को अरबी में सौम इसी लिये इस मास को अरबी में माह-ए-सियास भी कहते है। फारसी में उपवास को रोजा कहते है। भारत के मुस्लिम समुदाय पर फारसी प्रभाव ज्यादा होने के कारण उपवास को फारसी शब्द ही उपयोग किया जाता है।
उपवास के दिन सूर्योदय से पहले कुछ ख लेते है जिसे सहरी कहते है। दिन भर न कुछ खाते है न पीते है। शाम को सूर्यास्त मय के बाद रोजा खोल कर खाते है जिसे इतारी कहते है।
रमजान और इत्यादी बातें मुस्लिम समुदाय में रमजान को लेकर निम्न बाते अक्सर देखी जाती है, रमजान को नेकियों या पुन्यकार्यो का मौसम-ए-बहार बसंत कहा गया है। रमजान को नेकियो का मौसम भी कहा जाता है। इस महीने में मुस्लमान अल्लाह की इबादत उपासना ज्यादा करता है अपने परमेश्वर को सतुष्ट करने के लिए उपासना के साथ कुरान परायण, दान धर्म, करता है यह महीना समाज के गरीब और जरूरतमंद बंदो के साथ हमदर्दी का है। इस महीने में रोजादार को इतार कराने वाले के गुनाह माफ हो जाते है पैगम्बर मोहम्मद सल्ल, से आपके किसीसबाही साथी ने पूछा-अगर हममें से किसी के पास इतनी गुजांइस न हो क्या करे। तो हजरत मुहम्मद ने जबाब दिया कि एक खजूर या पानी से ही इतार करा दिया जाए। यह महीना मुस्तहिक लोगो की मदद करने का महीना है रमजान के तअल्लुक से हमें बेशुमार हदीसे मिलती है और हमें पढ़ते और सुनते कहते है लेकिन क्या हम इस अमल भी करते है। ईमानदारी के साथ हम अपना जायजा ले के क्या वाकही हम लोग मोहताजो और नादार लोगो की वैसी ही मदद करते है जैसी करनी चाहिए। सिर्फ सदकाए फित्र देकर हम यह समझते है कि हमने अपना हक अदा कर दिया है जब अल्लाह की राह में देने की बात आती है तो हमंे कजंूसी नही करना चाहिए।
अल्लाह की राह में खर्च करना अफजल है गरीब चाहे वह अन्य धर्म के क्यो न हो उसकी मदद करने की शिक्षा दी गई है। दूसरो के काम आना भी इबादत समझाी जाती है जकात, सदकघ, फित्रा, खैर, खैरात गरीबो की मदद दोस्त अहबाब में जो जरूरत मंद है उसकी मदद करना जरूरी समझा और माना जाता है। अपनी जरूरीरते को कम करना और दूसरे की जरूरते को पूरा करना अपने गुनाहो को कम और नेकियो को ज्यादा कर देता है। मोहम्मद सल्ल ने फरमाया है जो शख्स नमाज के रोजे ईमान और एहतेसाब अपने जायजे के साथ रखे उसके सब पिछले गुनाह माफ कर दिए जाएगें रोजा हमें परहेजगारी पैदा करता है। लेकिन अब जैसे ही माहे रमजान वाला होता है, लोगो के जहन में तरह-तरह के चटपटे और मजेदार खाने का तसुब्बर आ जाता है।

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अनुराग श्रीवास्तव विचारपरक के पत्रकार है |

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