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अपना अतीत खोजता धुरिया (गोंड़), समाज

श्रवण कुमार पटवा/अभिषेक श्रीवास्तव
विचारपरक सवांददाता
शोहरतगढ़ (सिद्धार्थनगर) 23 जनवरी , वर्तमान लोकतांत्रिक युग में जहां राजनीतिक दल देश के हर कोने में जातीय समीकरण का बीज बोकर भाई चारा सम्मेलन, पिछड़ा वर्ग सम्मेलन, ब्राहम्ण सम्मेलन, कायस्थ सम्मेलन, निषाद सम्मेलन, पटवा महासभा सम्मेलन आदि तमाम जातीय सम्मेलन करके अपना वोट बटोरने में लगे है, वहीं धुरिया/गोंड समाज अपना अतीत खोजने में व्यस्त है। आज उसे अपनी पहचान खोजना पड़ रहा है।
देश की आजादी के 69 वर्ष बाद भी इस समाज का जीवन नही बदला इसके पीछे क्या कारण है? कौन इनके अस्तित्व के साथ खिलवाड़कर रहा है? यह समाज कब तक बेखबर सोता रहेगा। आखिर क्या होगा धुरिया/गोंड समाज का जीवन? यह अपने आप में एक प्रश्न चिन्ह है! यह सवाल है बुद्ध जीवी वर्गो से, यह सवाल है समाज संस्थाओं से!, यह प्रश्न है संसद/विधान सभा में बैठने वाले राजनेताओं से कि इस गोंड/धुरिया समाज की जीवन यात्रा कब तक यूँ ही चलता रहेगा ? क्या इनके जीवन में भी डिजीटल इंडिया का नारा सार्थक होगा। क्या इनके जीवन में भी खुशहाली आयेगी। आखिर कोरे आश्वासनों एवं वायदो पर कब तक इन्हे अधिकार में रखा जायेगा।
यह एक कटु सच्चाई है जिसे इतिहास नही नकार सकता। यह ध्रुव सत्य है कि समाज के तथाकथित समाज के ठेकेदारों में इन्हे अपना गुलाम समक्षा तथा इन्हे ‘‘धुरिया’’ से कहाँर बना दिया। अपनी सेवार्थ करवाने के लिए भी आज समाज में ये नासूर की तरह इनके भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते चले आ रहे है।
इतिहास की ओर देखे तो इनका कुछ और ही इतिहास मिलता है पंडित जवाहर लाल नेहरू के शब्दो में ‘‘मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा की खुदाई से यह मान लेना चाहिए कि इस देश के मूल निवासी आदिवासी थे। द्रविण कोल, मील, उराव, संथाल एवं गोंड थे। प्रसिद्ध मूगर्भ शास्मी एडवर्ड सुयश में यहाँ तक लिखा है कि ‘‘गोण्डवान लैण्ड भी उत्पत्ति आज से 35 हजार करोड़ वर्ष के उपर भी है।’’ अबुल फजल नें अपनी पुस्तक आइने अकबरी में लिखा है इनके राज्यों की सीमा विस्तार, प्रसिद्ध पुरातत्ववेता स्व0 हीरा लाल साहब में ‘‘गोंड राजा’’ नामक पुस्तक लिखकर इनके इतिहास को प्रकाश में लाने की किया हैै।
आज इस युग में जहाँ प्रशासनिक अधिकारीयों/कर्मचारीयों का बोलबाला है वहाँ यह धरिया समुदाय कहाँ से अपनी पहचान बताये, कैसे इन्हे दिखाए कि वह वास्तव में ‘‘धुरिया’’ है कहाँर नहीं ? जहाँ इन अधिकारीयों के दूषित मानसिकता में विकार पनप रहा है तो भला इस समाज का कल्याण कैसे होगा ?
राजनीतिक दल के नेता इस समाज को झांसा देकर वोट लेते रहे और यह समाज इनके हाथों की कठपुतली बन कर इनके पीछे दौड़ते रहे, लेकिन आज इनका कोई आंसू पोछने वाला नदी है।
सेन्सस रिपोर्ट 1891 में जो डल्लू कुक नामक अंग्रेज द्वारा किया गया उसमें पेशे के आधार पर 17 जातियो को कहार शीर्षक में डाल दिया जिसकी पाण्डुलिपि आज भी शासन में एवं उसकी प्रतिलिपि समस्त जिलाधिकारीयों के मेज पर पड़ी है। 17 जातियो में वाथम, वोट, धीकर, धुरिया, नायक, खरवार, रैकथर, खानी, कमकर, महार, मल्लाह, निषाद आदि है। ये अलग-अलग जातिया है, जिनका आपस में रोटी एवं वेटी का सम्बन्ध नहीं रहता है 1891 के सर्वे रिपोर्ट में बस्ती जनपद में 39121 की जनसंख्या धुरिया गति की है। देश की आजादी के बाद इस की जनसंख्या आज कहा विलुप्त हो गयी? वर्ष 2003 में जन जाति आयोग उ0प्र0 रोड लखनऊ ने सभी जनपदो का सर्वे कराया जिसमें सिद्धार्थनगर जनपद में 3023 की जन संख्या दर्शायी गयी है।
भारत सरकार के तमाम राजपत्र/संविधान संशोधन उ0प्र0 सरकार द्वारा निर्गत सैकड़ो शासन देश बार-बार यह कहता है कि अमुक जनपदो में यह जाति पाई जाती है लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों के नजर में ये सब शासनादेश कूड़े के ढेर में फेक दिये जा रहे है। प्रशासनिक अधिकारियों/कर्मचारियो ने एक सूची कार्य क्रम बना लिया और एक वाक्य में शासनादेशो की धज्जिया उडा दिया कि इस जनपद में धुरिया नही पाये जातेे है।
देश के बदलते परिवेश में जहा सभी जातियां राजनीति मे अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर ली है। वही यह धुरिया समाज अपनी पहचान खोजने में व्यस्त है। इन प्रशसनिक अधिकारियो/कर्मचारियो को वह अपनी पहचान कैसे दिखाये? क्या समाज सेवी संस्थाओ/समाज सुधारको/राजनेताओ/अभिमण्डल में बैठने वाले मंत्रियो के पास इसका कोई समाधान है? यदि है? तो इस धुरिया समाज का उद्धार कब होगा? भारतीय नागरिक होने नाते संविधान के तहत इसका अधिकार कब और कैसे मिलेगा? और यदि इसका विकल्प नही ढूढा गया तो क्या यह धुरिया समाज यू ही ‘‘मृग मारीचिका‘‘ की तरह दलदल में पड़ा रहेगा? क्या इसी तरह अपनी वदकिस्मती पर आॅसू बहाता रहेगा। यदि इस धुरिया समाज के सवाल पर निर्णायक जवाब किसी के पास नही है तो लोकतंत्र का नारा लगाने वाले सभी संस्थाओ/नेताओ से अनुरोध है कि वे यह खोखला नारा लगाना बन्द कर दें।
उक्त के सम्बन्ध में जब अखिल भारतीय गोंड महासभा जिलाध्यक्ष शिवकुमार गोंड से बात की गयी तो उन्होने कहा कि इतिहास गवाह है कि 24 जून 1564 को गांेड रत्ना महारानी दुर्गावती का युद्ध मुगल सम्राट अकबर से हुआ इस युद्ध के बाद गोड समुदाय एवं उनकी पर्याय जातियां मध्य प्रदेश से पलायन करने देश के कई प्रान्तों में विखर गये। अपने आपको मुगल सेना से छिपाने के लिए बड़े समान्तों के यहां शरण लिए और सेवकान्दू करके अपने परिवार का जिविकोपार्जन करते चले आये।
इसके साथ उन्होने यह भी कहा कि हमारे पूर्वजों ने अपनी संस्कृति को बरकरार रखा तथा उसे आज भी धरोहर के रूप में प्रतिवर्ष ‘‘उज्जैनी पूजा’’ करते चले आ रहे है। इसमें काली की पूजा होती है और सुअर की बली चढ़ती है यह गोड़ी धर्म का प्रतीक है यदि इसे गम्भीरता से लिया जाय तो यह स्वतः स्पस्ट हो जाता है कि उज्जैन मध्यप्रदेश में है जिसका सीधा सम्बन्ध धुरिया/गोंड से है।

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अनुराग श्रीवास्तव विचारपरक के पत्रकार है |

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